वृंदावन का पहला मंदिर, 350 साल से कर रहा अपने आराध्य का इंतजार, औरंगज़ेब की क्रूरता से जुड़ी है कहानी

कहा जाता है कि मथुरा-वृंदावन समेत पूरे ब्रज में 5000 से भी अधिक छोटे-बड़े मंदिर है और हर मंदिर का अपना एक इतिहास है .वैसे तो वृंदावन में कई विश्व विख्यात मंदिर है लेकिन वृंदावन का मदन मोहन मंदिर सबसे पुराना मंदिर माना जाता है. 60 फीट ऊंचे शिखर वाला यह भव्य मंदिर अब भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है. इसका निर्माण मुल्तान के कपूर राम दास ने 1580 में कराया था.
वृंदावन के बांकेबिहारी मंदिर के वीआईपी गेट के पास परिक्रमा मार्ग पर स्थित है. श्री राधामदन मोहन मंदिर वृंदावन के सप्त देवालय मंदिर में भी शामिल है. मान्यता के अनुसार सप्त देवालय मंदिरों की स्थापना चैतन्य महाप्रभु के अलग-अलग शिष्यों ने की जिसमें से सबसे पहले श्री सनातन गोस्वामी ने ही मदन मोहन मंदिर की स्थापना की थी.
यह मंदिर वृंदावन के सबसे ऊंचे टीले पर स्थापित है जिसे द्वादश दत्य टीले के नाम से भी जाना जाता है. मंदिर सेवायत गोपाल दास बाबा ने बताया कि एक बार पंजाब के व्यापारी की रामदास खत्री जिन्हे कपूर राम दास के नाम से जाना जाता है. उसकी नाव आगरा जाने और दौरान वृंदावन के घाट पर अटक गई. 3 दिन तक कोशिश करने के बाद भी जब नाव नहीं निकली तो वह स्थानीय देवता को खोजने निकल पड़ा. उसे टीले पर सनातन गोस्वामी मिले और उन्होंने उससे मदन मोहन भगवान की प्रार्थना करने को कहा जैसे ही व्यापारी ने ऐसे किया उसकी नाव तैरने लगी.
आगरा से अपना सारा माल बेचने के बाद जब वह वापस आया तो कपूरी ने अपना सारा अर्जित धन सनातन गोस्वामी को दे दिया और इस मंदिर का निर्माण चौदहवीं शताब्दी में करवाया. इस मंदिर पर मुग़लों ने भी आक्रमण किया था. 1669 में औरगज़ेब ने जब ब्रज में आक्रमण किया था और इस मंदिर की एक चोटी को क्षतिग्रस्त कर दिया था जो आज भी टूटी अवस्था में मौजूद है.
जब औरंगज़ेब ने इस मंदिर पर आक्रमण किया था तब मंदिर के सेवायतों ने मंदिर के विग्रहों को सुरक्षित रखने के लिए मंदिर से छुपा कर राजस्थान के करौली ले जा कर स्थापित कर दिया और आज भी इस मंदिर के मूल विग्रह करौली के मंदिर में स्थापित है. यह मंदिर वृंदावन के उन मंदिरों में भी शामिल है जो लाल बलुआ पत्थर से बना हुआ है इस पत्थर से सिर्फ 5 मंदिर ही बने हुए है.

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