राजा की कुंडली तय करती है बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की तारीख!

भगवान नारायण के विश्व प्रसिद्ध धाम बद्रीनाथ (Badrinath Dham) में हर साल लाखों की संख्या में देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं. धाम के कपाट साल में 6 माह के लिए बंद रहते हैं, जबकि दर्शन के लिए 6 माह के लिए खोले जाते हैं. बद्री विशाल के कपाट खुलने एवं बंद होने दोनों प्रक्रियाएं बेहद रोचक है. दरअसल बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि प्रत्येक वर्ष वसंत पंचमी को टिहरी के राजदरबार में घोषित होती है.

मान्यता है कि पहले जनता के लिए राजा ही भगवान हुआ करते थे और राजा के ग्रहों की अनुकूलता को देखकर ही राजपुरोहित तिथि घोषित करते थे. सदियों से चली आ रही यह प्रक्रिया आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है और आज भी भगवान के प्रतिनिधि के तौर पर राजा की कुंडली देखकर ही धाम के कपाट खुलने की तिथि घोषित की जाती है.

बसंत पंचमी को निकाला जाएगा शुभ मुहूर्त
श्री बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथि बसंत पंचमी को प्रत्येक साल टिहरी के नरेंद्रनगर राजमहल में तय होती है. इस वर्ष बसंत पंचमी बुधवार यानि 14 फरवरी को है. इसी दिन राजदरबार नरेंद्रनगर (टिहरी) में विधि-विधान से पंचांग गणना के बाद कपाट खुलने की तारीख तय होगी. इसमें महाराजा मनुजयेंद्र शाह, सांसद माला राज्यलक्ष्मी शाह, श्री बदरीनाथ- केदारनाथ मंदिर समिति अध्यक्ष अजेंद्र अजय, राजकुमारी शिरजा शाह सहित बद्रीनाथ धाम के रावल की उपस्थिति में राजपुरोहित आचार्य कृष्ण प्रसाद उनियाल और टिहरी के महाराजा बद्रीनाथ के कपाट खुलने तिथि की घोषणा करेंगे.

टिहरी के राजा को क्यों कहा जाता है “बोलांदा बद्रीश”
टिहरी दरबार के प्रतिनिधि भवानी प्रताप बताते हैं कि टिहरी दरबार के राजपरिवार के लोग बद्रीनाथ जी के तेल कलश, गाडु कलश को ले जाने की जिम्मेदारी हजारों वर्षों से निभा रहे हैं. टिहरी राजवंश के पहले राजा सुदर्शन शाह को “बोलांदा बद्रीश” के नाम से भी जाना जाता था. मान्यता है कि जो भक्त भगवान बद्री विशाल के दर्शन करने नहीं पहुंच पाते थे, राजा के दर्शन मात्र से उन्हें धाम के दर्शन के समान पुण्य मिल जाता था.

राजमहल करता है बद्रीनाथ की व्यवस्था
बीकेटीसी के मीडिया प्रभारी डॉ हरीश गौड़ बताते हैं कि राजशाही के समय से ही धाम की व्यवस्था राजमहल से ही देखी जाती रही है. जिस कारण आज भी ज्योतिष गणना के बाद राजा की कुंडली में ग्रहों की अनुकूलता देखी जाती है, जिसके बाद विधि विधान के साथ मुहूर्त तय किया जाता है.
 

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