45 साल बाद पाकिस्तान में पूर्व पीएम भुट्टो को दी गई फांसी पर छिड़ी जंग 

इस्लामाबाद । पाकिस्तान में इन दिनों 45 साल पहले पूर्व पीएम जुल्फिकार अली भुट्टो को दी गई फांसी की सजा पर जंग छिड़ी हुई है। लंबे अरसे से पूर्व पीएम भुट्टो की फांसी के फैसले को गलत बताया जाता रहा है। अब मामले में अर्जी दाखिल की गई तब 9 जजों की संवैधानिक बेंच में मामले की बहस चल रही है। मांग है कि भले ही पूर्व पीएम भुटटों की जिंदगी नहीं लौटाई जा सकती, लेकिन उन्हें दोषी ठहराने के फैसले की समीक्षा हो सकती है। शीर्ष अदालत ने संकेत दिया है कि सोमवार तक इस मामले में बहस समाप्त हो सकती है। इस बीच सुनवाई के दौरान अदालत में एमिकस क्यूरी यानी न्याय मित्र के तौर पर पेश सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मंजूर मलिक ने इस फैसले को न्याय की हत्या करार दिया।
उन्होंने कहा कि यह ट्रायल ऑफ मर्डर नहीं था बल्कि मर्डर ऑफ ट्रायल था। उन्होंने अदालत से अपील कर कहा कि वे इस ऐतिहासिक गलती में सुधार करे। केस की सुनवाई चीफ जस्टिस काजी फैज इसा की अगुवाई वाली 9 जजों की बेंच कर रही है। दरअसल पूर्व पीएम भुट्टो को लाहौर हाई कोर्ट ने 18 मार्च, 1978 को फांसी की सजा दी थी। उन्हें पीपीपी के संस्थापक सदस्यों में से एक अहमद रजा कसूरी की हत्या का आदेश देने पर यह सजा दी गई थी। इस फैसले को बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी 4-3 के बहुमत से बरकरार रखा था और जिया उल हक के शासनकाल में उन्हें 4 अप्रैल, 1978 को ही फांसी दी गई थी। पूर्व पीएम भुट्टो को पसंद करने वालों की पाकिस्तान में बड़ी तादाद है। खासतौर पर उनकी पार्टी पीपीपी के सैकड़ों समर्थक उसमें शामिल हैं। 2008 से 2013 के दौरान पाकिस्तान में जब पीपीपी की हुकूमत थी, तब आसिफ अली जरदारी ने भुट्टो को मिली फांसी की सजा पर समीक्षा की अर्जी डाली थी। 
बता दें कि आसिफ अली जरदारी राष्ट्रपति रहे हैं और वे जुल्फिकार अली भुट्टो के दामाद हैं। भुट्टो के नाती बिलावल भुट्टो जरदारी भी राजनीति में हैं। जुल्फिकार की तरह ही उनकी बेटी बेनजीर भुट्टो की भी पाकिस्तान की सरेआम हत्या कर डाली गई थी। 
इस मामले में बहस के दौरान एमिकस क्यूरी ने भुट्टो को मिली सजा पर सवाल उठाए। उन्होंने एक अहम सवाल उठाकर कहा कि कसूरी की हत्या का आदेश देने का आरोप भुट्टो पर लगता है। लेकिन जब केस चला तब एक गवाह मसूद महमूद का बयान लिया और उन्होंने माना कि भुट्टो ने आदेश दिया था। लेकिन दूसरे गवाह का बयान नहीं लिया गया क्योंकि उसका दावा कुछ अलग था। उन्होंने कहा कि मसूद महमूद भी उसी जिले का था, जहां के कसूरी थी। 

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