नवरात्रि में क्यों बोए जाते हैं जवारे? दुर्गा माता से जुड़ी है इसकी मान्यता

सनातन धर्म में नवरात्र पर्व का बेहद महत्व माना जाता है. शारदीय नवरात्र हो या चैत्र नवरात्र दोनों में ही मां भगवती दुर्गा की पूजा विधि विधान से की जाती है. छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक मंदिरों में नवरात्रि बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है. छत्तीसगढ़ के प्रमुख शक्तिपीठों में यानी रतनपुर, चंद्रपुर, डोंगरगढ़, खल्लारी और दंतेवाड़ा प्रमुख है. रतनपुर में महामाया, चंद्रपुर में चंद्रसेनी, डोंगरगढ़ में बमलेश्वरी और दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी देवी विराजमान हैं. आज यानी 9 अप्रैल से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत हो रही है जो 17 अप्रैल तक माता भगवती की पूजा आराधना की जाएगी.

देवी मंदिरों में अखंड ज्योत जलाए जाते हैं. वहीं जवारा बोने की भी प्रथा परंपरा सदियों से चली आ रही है. नवरात्रि में घटस्थापना के दिन जवारा बोया जाता है. नवरात्रि में जवारा बोने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. मान्यता है कि बिना जवारा के माता आदिशक्ति दुर्गा की पूजा अधूरी मानी जाती है. सनातन धर्म के मन्यताओं के अनुसार जवारा के बोने से उगने और उसके रंग से कई तरह के संकेत मिलते हैं, हरा जवारा खुशहाली का प्रतीक होता है. सफ़ेद जौ अनुष्ठान सिद्धी का प्रतीक होता है.

दसवीं के दिन होता है जवारा का विर्सजन
पंडित मनोज शुक्ला ने बताया कि हमारे ईष्ट देवी देवताओं के प्रिय कार्यों के करने से उन्हें प्रसन्नता होती है. शास्त्रों में इसका वर्णन भी किया गया है. जब हमारे ईष्ट देवी-देवता प्रसन्न होते हैं तब वे हमारी मनोकामना पूरी करते हैं. जैसे भगवान कृष्ण को माखन मिश्री पसंद है, भगवान गणेशजी को मोदक और दूर्वा पसंद है उसी तरह से भगवती दुर्गा माता को प्रकृति बेहद पसंद है.

प्रकृति ही माता कहलाती है. प्रकृति का तात्पर्य हर तरह हरियाली का होना. इसीलिए हर देवी मंदिरों में नवरात्रि पर्व पर ज्योत स्थापना के साथ साथ जवारा भी बोई जाती है. यह जवारा सप्त धान होता है.जिनको नवरात्रि पर विधि विधान के साथ बोई जाती है. यह नौ दिन पर्यंत भगवती माता दुर्गा के सामने लहराते रहते हैं. यह दुर्गा माता को बेहद पसंद है. ग्रामीण इलाकों में नवमीं और दसवीं तिथि के दिन बड़े धूमधाम से जवारा का विर्सजन होता है.
 

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