अनोखा है छत्तीसगढ़ का यह मंदिर, माता का त्रिनात्मक स्वरूप भक्तों की मनोकामना करता है पूरी

छत्तीसगढ़ में इन दिनों बड़े ही धूमधाम और उत्साह के साथ चैत्र नवरात्रि पर्व मनाया जा रहा है. वैसे तो छत्तीसगढ़ में भगवती माता दुर्गा के अलग अलग रूपों में विराजमान कई शक्तिपीठ और सिद्धिपीठ स्थापित हैं. आज हम आपको राजधानी रायपुर स्थित श्री राजराजेश्वरी मां महामाया देवी के बारे में बताने वाले हैं.

राजधानी के पुरानी बस्ती स्थित आदि शक्तिपीठ के रुप में श्री राजराजेश्वरी मां महामाया देवी मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र है. इस मंदिर निर्माण 1482 में ‘हैहयवंशी’ राजा ने करवाया, इसका प्रमाण संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग द्वारा तैयार किए गए गजट में मिलता है.

मंदिर के पुजारी पंडित मनोज शुक्ला का कहना है, यह छत्तीसगढ़ के 36 शक्तिपीठों या 36 किलों में से एक है. 1400 साल पहले हैहयवंशी राजा मोरध्वज द्वारा निर्मित करवाए गए इस मंदिर में मां महामाया के साथ मां समलेश्वरी विद्यमान हैं. सूर्यास्त के समय सूर्य की किरणें मां महामाया के चरणों को छूती हैं, तो सूर्योदय के समय किरणें मां समलेश्वरी के चरणों को छूती हैं. इसका जीर्णोद्धार नागपुर के मराठा शासकों ने करवाया था, इसके भी प्रमाण मिले हैं.

पुरातत्व विभाग ने महामाया मंदिर परिसर में स्थित मां समलेश्वरी माता मंदिर को आठवी शताब्दी का मंदिर बताया गया है. उस हिसाब से 1400 वर्ष पुरानी है. लेकिन समलेश्वरी माता का मंदिर बहुत लंबे समय बाद बना उससे कई सौ वर्ष पहले महामाया मंदिर का निर्माण हुआ था. महामाया मंदिर हैहयवंशी राजाओं की कुलदेवी है. जहां जहां हैहयवंशी राजाओं ने अपना राजमहल बनाया वहां वहां उन्होंने कुलदेवी भगवती मां महामाया देवी को प्रतिष्ठित किया. यही कारण है कि छत्तीसगढ़ का नामकरण भी इनके द्वारा निर्माण किए गए गढ़ अर्थात किला से हुआ. छत्तीसगढ़ में 36 किले यानी गढ़ हैं और वहां मां महामाया देवी का मंदिर है.

राजा मोरध्वज ने कराया था मंदिर का निर्माण
पंडित मनोज शुक्ला ने आगे बताया कि द्वापर युग के अंतिम हैहयवंशी राजा मोरध्वज ने महामाया मंदिर का निर्माण करवाया था. भगवान कृष्ण और अर्जुन राजा मोरध्वज के यहां परीक्षा लेने आए थे. राजा के पुत्र को आरा से चीरकर भोजन कराने की परीक्षा ली थी. यह घटना आरंग क्षेत्र में हुआ था. इस किवदन्तियां को देखते हुए कहा जा सकता है कि महामाया मंदिर की ऐतिहासिकता और पौराणिकता लगभग 5000 वर्ष पूर्व की मिलती है.

मां महामाया देवी की मूर्ति और परिसर की विशेषता
पंडित मनोज शुक्ला ने आगे बताया कि भगवती मां महामाया देवी की श्रीविग्रह लगभग 6 फीट से बड़ी है. माता महाकाली स्वरूप में विराजमान हैं. गर्भगृह श्रीयंत्र रूप में बना हुआ है. अर्थात महालक्ष्मी स्वरूपा, श्रीयंत्र रूपी गर्भगृह में भगवती महाकाली के स्वरूप में विराजमान है. इसी परिसर में मां समलेश्वरी सरस्वती माता के रूप में विराजमान हैं. अर्थात माता का त्रिनात्मक स्वरूप इसी परिसर में विद्यमान है यही कारण है की भक्तों की मनोकामना बहुत जल्द पूरी होती है.

प्राचीन समय से यह एक तंत्र पीठ, सिद्धपीठ के रूप में प्रचलित है. यहां बड़े बड़े साधक और उपासक सिद्धि साधना किया करते थे इसीलिए यहां मनवांछित फल के लिए कामना करने वालों की मनोकामना पूरी होती है. यहां राजधानी रायपुर ही नहीं समूचे छत्तीसगढ़ के अलावा विदेश से भी भक्त दरबार में आते हैं.
 

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