करण जौहर के पापा का 12 लाख का नुकसान करा दिया था, उन्होंने जो बोला, उससे सबक मिला

‘दोस्ताना’ जैसी फिल्म से आगाज करने वाले निर्देशक तरुण मनसुखानी के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत अभिनय से की थी, मगर फिर उनकी चाहत उन्हें निर्देशन के क्षेत्र में ले आई। ‘कुछ कुछ होता है’, ‘मोहब्बतें’, ‘कभी खुशी कभी गम’, ‘कल हो न हो’ जैसे कई फिल्मों में 20 साल तक सहायक निर्देशक रहे तरुण दर्दनाक तलाक से भी गुजरे हैं, मगर इन दिनों चर्चा में हैं अपनी फिल्म ‘हाउसफुल 5’ से। उनसे एक खास बातचीत।

क्या आप हमेशा से फिल्म मेकिंग के क्षेत्र में आना चाहते थे?

-नहीं, बचपन में तो मैं बहुत मस्तमौला बच्चा था। मैं शिमला के पास हिमाचल में बोर्डिंग स्कूल में था और वहां मैंने पहली बार अभिनय किया था। मैं जब मुंबई आया, तो यहां मैंने इंटर कॉलेज में होने वाले सबसे बड़े कॉलेज फेस्टिवल मल्हार में भाग लिया था। मैं उस फेस्टिवल के एक नाटक में परफॉर्म कर रहा था कि वहां जज के रूप में जाने-माने फिल्मकार आनंद महेंद्रू आए हुए थे। मेरा अभिनय देख कर उन्होंने मुझे एक शो में अभिनय करने का प्रस्ताव दिया और वह शो था, ‘देख भाई देख’। मैंने इस सीरियल के एक एपिसोड में अभिनय किया, मगर फिर मुझे उतना मजा नहीं आया, जितना मुझे नाटकों में आता था। मैंने उनसे जाकर यह बात कह भी दी, तो वे बोले कि कैमरे के आगे मजा नहीं आ रहा है, तो पीछे आ जाओ और मैं उनका असिस्टेंट बन गया। वहां मुझे बहुत मजा आने लगा। मैं तो वहां 22 घंटे काम किया करता था। फिर एक इन मुझे करण जौहर का फोन आया कि वे अपनी पहली फिल्म ‘कुछ कुछ होता है’ शुरू करने जा रहे हैं और क्या मैं उनका असिस्टेंट बनना चाहूंगा? असल में मेरी बहन उनके स्कूल में थी और इस तरह मुझे ये ऑफर मिला। मैंने 20 साल गुजारे हैं करण जौहर के प्रोडक्शन के साथ और उनके यहां मैंने ‘कुछ कुछ होता है’ पर काम किया फिर एक साल के लिए मैं यशराज में सहायक निर्देशक रहा और मैंने ‘मोहब्बतें’ कीं। मैं वापस करण के पास आया और मैंने ‘कभी ख़ुशी कभी गम’, ‘कल हो न हो’ और ‘कभी अलविदा न कहना’ जैसी फिल्मों में असिस्टेंटशिप की। फिर अंततः 2008 में मुझे ‘दोस्ताना’ में इंडिपेंडेंट निर्देशक बनने का मौका मिला।

आपने अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, सलमान खान जैसे दिग्गजों के साथ सहायक निर्देशक के रूप में काम किया। क्या सीख मिली? कभी डांट भी मिली?
-मैंने मिस्टर बच्चन से सीखा कि काम के प्रति समर्पण क्या होता है? वो ऐसे काम करते हैं, जैसे कल ही इंडस्ट्री में आए हों। उनसे यही सीखने मिलता है कि दुनिया या काम को ग्रांटेड मत लो। मुझे आज भी याद है कि जब मैं दोस्ताना शुरू कर रहा था, तब शाहरुख खान ने मुझे आकर एक सलाह दी थी कि सेट पर जाकर मैं कैमरा एंगल के बारे में कितना भी सोचूं, मगर मेरा अहम काम है कास्ट के साथ-साथ क्रू को भी संभालना। मैंने उनसे सीखा कि अपने सेट पर मौजूद लोगों को खुश और उत्साही रखना है। मुझे एक घटना अच्छी तरह से याद है, जब हम ‘कभी खुशी कभी गम’ बना रहे थे तब यश जौहर (करण जौहर के निर्माता पिता) ने आकर मुझसे कहा कि उन्हें फिल्म का एक पोस्टर चाहिए। मैंने 30 बाई 40 फीट का एक होर्डिंग बनवा लिया, जबकि उन्हें 30 बाई 40 इंच का चाहिए था। उस होर्डिंग की कीमत थी 12 लाख। मेरे तो होश उड़ गए कि मैंने इतना बड़ा नुकसान करवा लिया, मगर यश जौहर जी मुझ पर जरा भी गुस्सा नहीं हुए। वे प्यार से आकर बोले, बेटा कुछ पता न हो, तो पूछ लिया करो। उनसे सीख मिली की सवाल पूछना चाहिए और जानकारी पक्की रहनी चाहिए।
आपकी फिल्म ‘दोस्ताना’ के बाद 17 साल का गैप आया और हमने सुना है कि उस दौर में आपका डिवोर्स आपके लिए आर्थिक तौर पर काफी घातक साबित हुआ?
-हां, ये सच है। देखिए सफलता-असफलता और आलोचनाओं से मैं कभी डरा नहीं। मैंने 17 सालों में बहुत कुछ सीखा और कई उतार-चढ़ाव देखे। हां, सभी जानते हैं कि मेरे तलाक ने मुझे आर्थिक और भावनात्मक रूप से तोड़ कर रख दिया था। मैं उसके बारे में ज्यादा बात नहीं करता, क्योंकि मैं उसे काफी निजी मानता हूं, मगर यकीनन वो बहुत ही टफ पीरियड था। उसके बाद मेरी जिंदगी में आर्थिक रूप से समस्याएं बढ़ गई थीं, मगर मैंने अपने दोस्तों और परिवार के मदद से उन बाधाओं को पार किया। वो मुश्किल समाय था, मगर जिंदगी को मैंने द एंड नहीं माना और फिर नई शुरुआत की। मैं भी डिप्रेशन से गुजरा, मगर मेरे पास सपोर्ट सिस्टम था। मैं उस गैप में लिखने-पढ़ने में मसरूफ रहा। मैंने अपने जज्बातों और दुख को स्क्रिप्ट के रूप में उतारा। मुझे अपनी कंपनी पसंद आने लगी और मैं खुद अपना सबसे अच्छा दोस्त बन गया।
आपकी ताजातरीन फिल्म ‘हाउसफुल 5’ की बात करूं तो बॉक्स ऑफिस के नजरिए से इसे दर्शकों का प्यार मिला है, मगर आलोचकों की सराहना नहीं मिली?
-आप इस फिल्म के पार्ट 5 की बात कर रही हैं, मगर आप यदि इसके पिछले तमाम पार्ट देखें, तो इसके किस भाग को क्रिटिक्स ने प्यार दिया है? क्रिटिक्स ने कभी हाउसफुल को प्यार नहीं दिया क्योंकि वो फिल्म को उस नजरिए से देखते ही नहीं हैं कि यह एक लाइट हार्टेड स्लैपस्टिक कॉमिडी है, जिसमें आपको ज्यादा सोचना ही नहीं है। आपको इस फिल्म को जस्ट इंजॉय करना है। मैं उनके नजरिए के बारे में कुछ कह नहीं सकता। उनके ओपिनियन मेरे लिए इतने मायने नहीं रखते क्योंकि मेरे लिए दर्शक मायने रखते और उन्हें फिल्म पसंद आई है।
फिल्म पर हीरोइनों को ऑब्जेक्टिफाय करने के आरोप भी लगे हैं?
-इस मुद्दे पर मैं यही कहूंगा कि जो लोग ये इल्जाम लगा रहे हैं, वो बहुत सिलेक्टिव बन रहे हैं क्योंकि वे ये क्यों नहीं कह रहे कि डीनो मोरिया दो सीन में बगैर शर्ट के हैं। मेरे तीन लीड एक्टर्स ने अपनी पेंट नीचे कर अपने बम दिखाए हैं। तो इस तरह से मैं मर्दों को ऑब्जेक्टिफाय नहीं कर रहा हूं? आप अगर फिल्म को टोटैलिटी में देखेंगे, तो पाएंगे कि इसमें मिसोजिनिस्ट (महिला द्वेष) या सेक्सिट कुछ भी नहीं है
आपकी फिल्म में सितारों का मेला लगा है, सबसे ज्यादा आपकी बॉन्डिंग किससे रही है? 
-फिल्म के सभी सितारों से मेरी अच्छी जमती है, मगर बॉन्डिंग अभिषेक बच्चन से रही है क्योंकि मैं उन्हें 16 साल की उम्र से जानता हूं। जब मैंने देख भाई देख में काम शुरू किया था, उस वक्त उस सीरियल की निर्मात्री जया आंटी (जया बच्चन) थी और उस जमाने में अभिषेक सेट पर अपनी मम्मी को मिलने आते थे, तब से हमारी दोस्ती है, जो अलग ही चलती है। रितेश देशमुख को भी मैं सालों से जानता हूं और मैंने उनका एक अलग पहलू भी देखा है, जो निर्देशक का है। वे बेहद प्रोफेशनल और वक्त के पाबंद हैं। अक्षय सर (अक्षय कुमार) के बारे में क्या कहूं? वे तो कमाल के हैं। फिल्म बनाने में उन्होंने मेरी बहुत मदद की।
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