मनमोहन वैद्य बोले,देशभक्ति के नाम से गलत नैरेटिव चल रहा

"कैसी गलत बातें होती हैं आश्चर्य होता है कुछ बातें हम मान लेते हैं कि यही सही है। एक बड़ा देशभक्ति गीत है खासकर 15 अगस्त को गाया जाता है। हमारे सिपाही उस पर नाचते हैं। "सारे जहां से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा, हम बुलबुले हैं इसके ये गुलिस्तां हमारा"…. मैं कई लोगों से पूछता हूं कि इसमें दूसरे वाक्य का अर्थ क्या है? सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां समझ में आता है लेकिन गुलिस्तां मतलब बगीचा है ये भी समझ गया। कि हम बुलबुल हैं जो पक्षी हैं वे वहां पर गुल खाने पराग खाने आते हैं, अगर यहां पराग नहीं मिला तो जहां गुल मिलेगा वहां जाएंगे। हमारा संबंध क्या है तो हमारा पढ़ा लिखा वर्ग ज्यादा बाहर क्यों जा रहा है? वहां गुल ज्यादा मिल रहा है? वहां देशभक्ति नहीं क्या?

जब मैं पूछता हूं कि बुलबुल नहीं तो हम कौन हैं? तो कई लोग कहते हैं हम माली, कई कहते हैं हम रक्षक हैं। बाद में कहते हैं हम मालिक हैं। एक उत्तर आता है हम इसके पौधे हैं हमसे बगीचा बना है। जिस किस्म का प्लांट है तो उत्तम फूल लगे, उत्तम फल लगे। बगीचे को आग लगेगी तो सबसे पहले बुलबुल उड़ जाएगी, लेकिन पौधे यहीं रहने वाले हैं। कितना गलत नैरेटिव हमारी देश भक्ति के नाम से चल रहा है।

पूर्व उप राष्ट्रपति भी मंच पर थे मौजूद दरअसल, भोपाल के रवीन्द्र भवन में शुक्रवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सह सरकार्यवाह मनमोहन वैद्य की किताब "हम और यह विश्व" का विमोचन पूर्व राष्ट्रपति जगदीप धनखड़, ऋतेश्वर महाराज और वरिष्ठ पत्रकार विष्णु त्रिपाठी ने किया।

कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में संघ के पूर्व सह सरकार्यवाह मनमोहन वैद्य ने प्रसिद्ध देशभक्ति गीत "सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा, हम बुलबुले हैं इसके ये गुलिस्तां हमारा" को लेकर ऐतराज जताया। संघ के कार्यक्रम में प्रणव दा विरोध हुआ तो अंदर का लेखक जगा पूर्व सह सरकार्यवाह मनमोहन वैद्य ने कहा- मेरे लेखन कला का काफी वर्णन हुआ। वैसे मैं लेखक नहीं हूं। कभी-कभार किसी ने लेख मांगा तो लिखना आता है ये बात सही है। एक घटना ने मेरे अंदर के लेखक को जागृत किया है। जैसे एक घटना के कारण महर्षि बाल्मीकि की काव्य रस धारा फूट पड़ी। शुरुआत यहां से हुई है। वो घटना थी संघ के तृतीय वर्ष के वर्ग समापन में पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को बुलाया था। वे संघ के स्वयंसेवकों को एड्रेस करने वाले थे। एक अनुभवी, अध्ययनशील सीनियर राष्ट्रीय नेतृत्व का बिना कारण इतना विरोध हुआ। वो संघ जॉइन नहीं करने वाले थे सिर्फ संघ के लोगों को संबोधित करने वाले थे। जिन विचार के लोग उनको अपना मानते थे उनको आनंदित होना चाहिए था कि हमारे आदमी को बुलाया है कुछ खरी-खरी सुनाएंगे।

संघ का विरोध करने से भी संघ को फायदा हुआ मनमोहन वैद्य ने कहा- प्रणव दा का प्रत्यक्ष राजनीतिक जीवन जिनका आयु से अधिक है। ऐसे लोग बेवजह विरोध कर रहे थे। ये देखकर मैंने पहला लेख लिखा। उसके बाद लेखों का क्रम चलता रहा। तो जिन्होंने विरोध किया मैं उनको धन्यवाद देता हूं कि उन्होंने मेरे अंदर का लेखक जगा दिया। मेरे पिताजी लेखक थे लेकिन मैं नहीं था उस विरोध के कारण ही तो मेरा फायदा हुआ। संघ का भी फायदा हुआ कि उसका भी बहुत सारा प्रचार हुआ। उस कार्यक्रम में दुनिया भर के चैनल्स के लोग उपस्थित थे। इसलिए करोड़ों लोगों ने उस कार्यक्रम को घर बैठे देखा और सुना।

वेबसाइट पर एक महीने में 48 हजार लोगों की रिक्वेस्ट आईं मनमोहन वैद्य ने कहा- वो कार्यक्रम 7 जून 2018 को था। जिनको संघ से जुड़ना है उन्हें ये पता नहीं कि किससे मिलना है। तो एक से छह जून तक संघ की वेबसाइट पर रोज औसतन 378 रिक्वेस्ट आती थी। 7 जून को 1780 रिक्वेस्ट आई। ये संघ का बेवजह विरोध करने से कभी-कभी संघ का फायदा होता है। संघ की वेबसाइट पर हमने जॉइन आरएसएस की शुरुआत की। तो 2017 से 2024 तक आठ सालों में प्रतिवर्ष करीब एक लाख लोगों की रिक्वेस्ट आई हैं इनमें अधिकतर यूथ हैं। अक्टूबर 2025 के एक ही महीने में संघ की वेबसाइट पर 48890 रिक्वेस्ट आई हैं। क्योंकि, संघ का शताब्दी वर्ष शुरू हुआ स्वयंसेवक संपर्क कर रहे हैं। ये तो संघ के कार्यकर्ताओं के प्रयासों के कारण हुआ है।

कर्नाटक में विरोध के बाद 7 गुना तेजी से लोग जुडे़ मनमोहन वैद्य ने कहा कर्नाटक में बेवजह संघ का विरोध होने लगा। कर्नाटक में पिछले अक्टूबर से इस अक्टूबर की तुलना करें तो 7 टाइम ज्यादा है। देश भर में डबल है। प्रणव दा के संघ के कार्यक्रम में आने का जो विरोध हुआ उस कारण मेरे अंदर का एक लेखक जागृत हुआ। दुनिया में भारत की एक अलग पहचान और आचरण रहा है। क्योंकि भारत के जीवन का दृष्टिकोण यूनिक है क्योंकि, उसका आधार अध्यात्म है। इसलिए जीवन का दृष्टिकोण होलिस्टिक है। इसलिए वसुधैव कुटुंबम भारत केवल मानता नहीं बल्कि जीता है।

दुनियां में सबसे ज्यादा व्यापार भारत का था मनमोहन वैद्य ने कहा 1700 साल तक दुनिया में सर्वाधिक व्यापार भारत का था। 33% से अधिक था जबकि अमेरिका, यूरोप मिलाकर 2 प्रतिशत से कम था। तो दुनिया भर में हमारे लोग गए लेकिन वी डिड नॉट कॉलोनाइज्ड दैम। उनको गुलाम बनाओ ये भारत की सोच ही नहीं थी। भारत सबको एक ही मानता है। तो लूटेंगे किसको ये भारत की विशेषता है।

कोरोना में जान की परवाह किए बिना लोगों ने सेवा की मनमोहन वैद्य ने कहा कोरोना काल में हमने देखा है कोरोना दुनिया भर में था लेकिन भारत के सिवा सभी देशों में केवल सरकारी कर्मचारी लोगों की सेवा में जुटे थे। भारत में सरकारी कर्मचारियों के साथ ही लाखों लोग बाहर निकले। बाढ़, आपदा, लैंडस्लाइड में सेवा करना अलग बात है। लेकिन ये बात जानते हुए कि घर के बाहर निकलने पर मेरी जान को खतरा है इसके बावजूद लाखों लोग सेवा के लिए निकले। इसलिए भारत और भारतीय अवधारणा को समझना जरूरी है। दुर्भाग्य से दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जिसके दो नाम हैं बाकी किसी देश के दो नाम नहीं हैं। सभी देशों में डेमोक्रेसी है राजनीति है दो तीन दल हैं लेकिन हम कौन हैं इसके बारे में सबका एक मत है।

वर्मा का नाम ब्रह्मदेश था भारत के बगल का देश पहले ब्रह्मदेश नाम था अंग्रेजों ने उसका नाम वर्मा किया आजादी के बाद उन्होंने म्यांमार किया। लेकिन वर्मा छोड़ दिया। वो केवल म्यांमार कहते हैं। जब तक हम कौन हैं ये तय नहीं करते तब तक हमारी दिशा तय नहीं होती। आजादी के बाद बहुत सारे प्रयत्न हुए लेकिन हम दिशा तय नहीं कर पाए। क्योंकि हमने भारत की अवधारणा को समझा नहीं। इसलिए हमारी विदेश नीति, अर्थ नीति, शिक्षा नीति पश्चिम की नकल करने में लगी है।

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