जमकर पैसा विदेश भेज रहे हैं लोग, टूट गया 13 महीने का रेकॉर्ड, जान लीजिए असली वजह

नई दिल्ली: भारत से विदेश भेजे जाने वाले पैसे में सितंबर में बड़ा उछाल आया है। TOI की एक रिपोर्ट के मुताबिक आरबीआई की लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत सितंबर में करीब 2.8 अरब डॉलर विदेश भेजे गए जो पिछले 13 महीनों में सबसे ज्यादा है। ऐसा मुख्य रूप से लोगों के घूमने-फिरने पर खर्च करने की वजह से हुआ है। यह रकम पिछले साल सितंबर के मुकाबले लगभग 1% ज्यादा है। पिछले साल यह 2.76 अरब डॉलर थी। अगस्त के मुकाबले भी यह 5% ज्यादा है, जो उस महीने 2.6 अरब डॉलर थी। LRS के तहत भारत के लोग एक वित्तीय वर्ष में 250,000 डॉलर तक आसानी से विदेश भेज सकते हैं।

हालांकि इस वित्त वर्ष की शुरुआत से लेकर सितंबर तक की बात करें तो विदेश भेजे गए कुल पैसे में थोड़ी कमी आई है। अप्रैल से सितंबर 2025 के बीच यह 14.8 अरब डॉलर रहा जबकि अप्रैल से सितंबर 2024 के बीच यह 15.6 अरब डॉलर था। पैसे भेजने के तरीकों में भी बदलाव आ रहा है। विदेश यात्रा पर खर्च अब भी सबसे बड़ा हिस्सा है। सितंबर में यह 1.7 अरब डॉलर रहा, जो पिछले साल के मुकाबले 2.8% कम है। लेकिन कुल भेजे गए पैसे में इसका हिस्सा बढ़कर 58% हो गया है। दस साल पहले यह सिर्फ 14% था। यह दिखाता है कि अब भारतीय विदेश घूमने-फिरने पर सबसे ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च कर रहे हैं

पढ़ाई पर खर्च में कमी

दूसरी तरफ, दूसरे कामों के लिए भेजे जाने वाले पैसे में कमी आई है। विदेश में पढ़ाई के लिए भेजे जाने वाले पैसे में 17.4% की गिरावट आई और यह 264 मिलियन डॉलर रहा। अगस्त में छात्रों द्वारा सत्र की तैयारी के लिए भेजे गए पैसे में जो बढ़ोतरी देखी गई थी, वह अब कम हो गई है। रिश्तेदारों के भरण-पोषण के लिए भेजे जाने वाले पैसे में भी नरमी आई है। शिक्षा पर खर्च का हिस्सा, जो 2021 में 30% तक पहुंच गया था, अब 10% से नीचे चला गया है। रिश्तेदारों की मदद के लिए भेजे जाने वाले पैसे, जो 2016 में लगभग 30% थे, अब 12-15% के आसपास हैं। हालांकि कुल राशि थोड़ी बढ़ी है।

सितंबर में सबसे बड़ा बदलाव विदेश में इक्विटी और डेट (शेयर और बॉन्ड) में निवेश के रूप में देखा गया। यह पैसा दोगुना से ज्यादा होकर 279 मिलियन डॉलर हो गया। बैंक बता रहे हैं कि लोग अब ग्लोबल मार्केट में पैसा लगाने के लिए ज्यादा इच्छुक हैं। ईटीएफ की बढ़ती उपलब्धता और टेक स्टॉक्स की चमक ने इसमें मदद की है। लेकिन कुल मिलाकर देखें तो इस श्रेणी का हिस्सा कम हुआ है। 2012 में यह लगभग 24% था, जो अब हाल के वर्षों में 5-7% रह गया है। म्यूचुअल फंड के जरिए विदेशी निवेश की सीमा भी इसमें एक वजह है।
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