अब एक्स-रे मशीन से मिलेगी सीटी स्कैन जैसी थ्रीडी इमेज, आसान होगा इलाज

भोपाल। अभी तक हमें हड्डियों की थ्रीडी तस्वीर देखने के लिए महंगी और भारी-भरकम सीटी स्कैन मशीन की जरूरत पड़ती थी, जिसमें रेडिएशन (हानिकारक किरणों) का खतरा भी ज्यादा होता है। लेकिन अब एम्स और आइआइटी इंदौर के विज्ञानी एक ऐसी एक्स-रे मशीन तैयार कर रहे हैं, जो सीटी स्कैन जैसी थ्रीडी तस्वीरें देगी।

यह मशीन हल्की और पोर्टेबल होगी, रेडिएशन भी बेहद कम होगा। ऐसे में इसे एम्बुलेंस, आपदा स्थलों और ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक आसानी से इस्तेमाल किया जा सकेगा।

अस्पताल पहुंचने से पहले सटीक आकलन हो सकेगा

फायदा यह होगा कि मरीज के अस्पताल पहुंचने से पहले ही एम्बुलेंस में उसकी चोट की गंभीरता का सटीक आकलन हो सकेगा। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) ने इस मशीन को अपनी प्रतिष्ठित योजना ‘फर्स्ट इन द वर्ल्ड चैलेंज-2025’ में जगह दी है। यह ‘हाई-रिस्क, हाई-रिवार्ड’ प्रोग्राम है, जिसके तहत मशीन को विकसित करने के लिए आठ करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं।

इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भी उपयोग

मशीन बनाने वाली टीम में एम्स से डॉ. अंशुल राय, डॉ. सैकत दास, डॉ. सुदीप कुमार और आइआइटी इंदौर से डॉ. लोकेश बसवराजप्पा व डॉ. पुनीत गुप्ता शामिल हैं। इस परियोजना के प्रधान अन्वेषक और एम्स के ट्रामा एवं इमरजेंसी मेडिसिन विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. बीएल सोनी ने कहा कि एक्सीडेंट या ट्रामा मरीजों को अभी सीटी स्कैन के लिए बड़े अस्पतालों में ले जाना पड़ता है।
हमारी कोशिश है कि मशीन इतनी पोर्टेबल हो कि इसे एंबुलेंस, छोटे क्लीनिक और गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) तक पहुंचाया जा सके। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) का उपयोग भी कर रहे हैं।

अभी चेहरे और जबड़े की इमेजिंग के लिए कर रहे तैयार

डॉ. बीएल सोनी ने कहा कि अभी हम इसे चेहरे और जबड़े (मैक्सिलोफेशियल) की इमेजिंग के लिए तैयार कर रहे हैं। इससे एक्सीडेंट में चेहरे पर लगी चोटों, कैंसर और रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी में डॉक्टरों को सटीक थ्रीडी इमेज मिलेगी, जिससे इलाज बेहतर होगा। बाद में इसे पूरे शरीर की जांच के लिए विकसित किया जाएगा।

क्यों खास है यह परियोजना? सस्ता और सुलभ

भारी मशीनों की जरूरत खत्म होगी, जिससे जांच सस्ती होगी। इसमें अल्ट्रा-लो रेडिएशन तकनीक है। यानी सीटी स्कैन के मुकाबले मरीजों (खासकर बच्चों) को रेडिएशन का खतरा बहुत कम होगा। एंबुलेंस में मशीन होने से अस्पताल पहुंचने से पहले ही डॉक्टर मरीज की हालत देख सकेंगे।
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