गेम के चक्कर में फांसी…फ्री-फायर में ‘प्रो’ दिखने का प्रेशर

भोपाल, भोपाल के पिपलानी इलाके में 14 वर्षीय छात्र अंश साहू की आत्महत्या के बाद जो तस्वीर सामने आ रही है, वह केवल एक हादसे की नहीं, बल्कि बच्चों को घेरते जा रहे ऑनलाइन गेमिंग के खतरनाक दबाव की है। बातचीत में सामने आया है कि अंश जिस ऑनलाइन गेम ‘फ्री फायर’ का आदी था, उसमें जीत से ज्यादा ‘दिखने’ की होड़ थी, बेहतर हथियार, चमकदार स्किन, महंगे कैरेक्टर और ऑनलाइन रुतबा।

परिवार के मुताबिक अंश पहले से ही उस गेम को खेल रहा था। एक महीने पहले उसकी मोबाइल आदत को देखते हुए घरवालों ने अंश से मोबाइल ले लिया गया था, ताकि पढ़ाई पर ध्यान दे सके। इसके बाद वह सामान्य व्यवहार करता रहा। न नींद में कमी, न चिड़चिड़ापन, न पढ़ाई में कमी यही वजह है कि घरवालों को किसी बड़े खतरे का अंदेशा नहीं हुआ।

दादा के मोबाइल से निकले 28 हजार रुपए, तब खुला राज

अंश के मामा भोला साहू बताते हैं कि कुछ समय पहले दादा के मोबाइल खाते से करीब 28 हजार रुपए कट गए थे। शुरुआत में अंश ने पैसे खर्च करने से इनकार किया, लेकिन बैंक स्टेटमेंट सामने आने के बाद पता चला कि रकम ऑनलाइन गेम में खर्च हुई थी।

परिवार का कहना है कि उस वक्त बच्चे को समझाया गया, डांट-फटकार नहीं की गई। इसके बाद उसने दोबारा मोबाइल इस्तेमाल नहीं किया। मामा के अनुसार, यह गेम बच्चों को लगातार यह अहसास देता है कि अगर आप ज्यादा पैसा खर्च करेंगे तो आप ज्यादा ‘प्रो’ दिखेंगे। बेहतर गन, बेहतर स्किन और ज्यादा ताकत यही इस गेम की दुनिया है।

खेल रहा था फ्री फायर गेम घटना के समय मृतक के माता-पिता पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल होने गए थे, जबकि बच्चा नहाने और कपड़े बदलने के लिए घर लौटा था। एएसआई सुरेश कुमार के अनुसार, बच्चा इससे पहले नाना के घर आयोजित कार्यक्रम में मौजूद था और वहीं से सीधे घर आया था।

पुलिस को परिजनों से जानकारी मिली है कि बच्चा मोबाइल पर फ्री फायर (Free Fire) नाम का ऑनलाइन गेम खेलता था। इसी गेम को लेकर उसे पहले भी घर में समझाइश दी गई थी। हालांकि मोबाइल या गेम को लेकर घर में किसी तरह के बड़े विवाद या झगड़े की बात सामने नहीं आई है। पुलिस के मुताबिक बच्चे का व्यवहार सामान्य था ।

‘प्रो’ दिखने की होड़, पैसे नहीं तो बेचैनी

गेम खेलने वालों के मुताबिक ऑनलाइन गेम में कोई सीधा टास्क सिस्टम नहीं होता, लेकिन मानसिक दबाव जबरदस्त होता है। खिलाड़ी को हर वक्त अपग्रेड चाहिए। हथियार चमके, कैरेक्टर अलग दिखे, सामने वाला प्रभावित हो। अगर पैसे नहीं हैं तो बेचैनी बढ़ती है।

यही बेचैनी धीरे-धीरे नशे जैसी बन जाती है। एक गेमर के अनुसार, लोग इसमें हजारों नहीं, लाखों रुपए तक खर्च कर देते हैं। कम उम्र के बच्चों के लिए यह दबाव और भी खतरनाक हो जाता है, क्योंकि वे यह समझ नहीं पाते कि वर्चुअल रुतबा असल जिंदगी से अलग है।

टॉपर छात्र, नेशनल लेवल स्केटर, जीते कई मेडल

अंश के मामा ने बताया अंश केवल एक मोबाइल गेम खेलने वाला बच्चा नहीं था। वह पढ़ाई में टॉपर था। स्केटिंग में नेशनल लेवल तक खेल चुका था। उसके पास अनेक गोल्ड मेडल थे। परिवार का कहना है कि अंश शांत, समझदार और अनुशासित बच्चा था। माता-पिता से उसके संबंध सामान्य और सकारात्मक थे। मोबाइल को लेकर कोई बड़ा विवाद या झगड़ा सामने नहीं आया।

घटना वाले दिन क्या हुआ

घटना वाले दिन परिवार नाना की तेरहवीं से जुड़े कार्यक्रम में शामिल होने गया था। अंश पहले वहां मौजूद था। इसके बाद नहाने के लिए घर लौटा। उसी दौरान अंश ने मां का मोबाइल लिया और गेम खेला। कुछ ही देर बाद, जब परिवार लौटकर आया, तो अंश फंदे पर लटका मिला।

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