भोपाल में केरवा-कलियासोत डैम में भराव पर एनजीटी सख्त, कैचमेंट में मिट्टी डालने पर होगी जेल

भोपाल। केरवा और कलियासोत डैम क्षेत्र में भू-माफियाओं द्वारा किए जा रहे सुनियोजित अतिक्रमण पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने कड़ा प्रहार किया है। अधिकरण ने स्पष्ट कर दिया है कि वहां की भूमि भले ही निजी हो, लेकिन यदि उस पर होने वाली गतिविधियां जलाशय, वेटलैंड या जलाशय के जलग्रहण क्षेत्र को नुकसान पहुंचाती हैं, तो उन्हें बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

एनजीटी ने यह रुख पर्यावरण कार्यकर्ता रशीद नूर खान की याचिका पर सुनवाई करते हुए अपनाया। इस याचिका के जरिए एनजीटी को बताया गया था कि महुआखेड़ा क्षेत्र में केरवा डैम के फुल टैंक लेवल (एफटीएल) के भीतर 2000 से अधिक डंपरों के माध्यम से अवैध मिट्टी, कोपरा और मुरम डाली गई है। इस भराव का मुख्य उद्देश्य जलाशय के जलग्रहण क्षेत्र को समतल कर भविष्य में कॉलोनी काटना और अवैध निर्माण करना था।

जल पारिस्थितिकी को गंभीर खतरा

मामला सामने आने के बाद एनजीटी ने अधिकारियों की एक संयुक्त समिति को जांच सौंपी थी। इस संयुक्त समिति की जांच में पाया गया कि कई स्थानों पर 10 फीट ऊंची मिट्टी की परत बिछाकर जलाशय की जल भंडारण क्षमता और जल पारिस्थितिकी को गंभीर खतरा पैदा किया गया है। इस समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद एनजीटी की भोपाल बेंच ने सख्ती का आदेश जारी किया है।


एनजीटी ने चेतावनी देते हुए कहा है कि आदेशों की अवहेलना करने वालों पर भारी जुर्माना और कानूनी कार्रवाई हो सकती है। इन गतिविधियों से स्थानीय पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई भी दोषियों से ही कराई जाएगी। इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता हर्षवर्धन तिवारी ने तर्क रखे।


पेट्रोलिंग और सीमांकन अनिवार्य

एनजीटी ने कहा है कि जल संसाधन विभाग को महीने में कम से कम दो बार क्षेत्र में गश्त करनी होगी, ताकि भविष्य में डंपिंग रुक सके। राज्य वेटलैंड प्राधिकरण को केरवा डैम के आसपास के प्रभाव क्षेत्र की पहचान और सीमांकन का कार्य दो महीने में पूरा करना होगा। अधिकरण ने साफ किया कि 33 मीटर के बफर जोन का उल्लंघन करने वाले भू-स्वामियों के खिलाफ कार्रवाई विधिसम्मत है और उन्हें अवैध मलबा हटाना ही होगा।


कलेक्टर को सौंपा पेड़ लगवाने का काम

एनजीटी ने कलेक्टर और पंचायत अधिकारियों को कैचमेंट क्षेत्र से अवैध कब्जे हटाने के लिए कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए हैं। यह भी कहा है कि वे इस क्षेत्र में पेड़ लगाने और मिट्टी बचाने का भी काम करें, ताकि डैम लंबे समय तक सुरक्षित रहे। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी सतत निगरानी के लिए निर्देशित किया गया है।


आदेश में कहा- पर्यावरण को बचाना राज्य की जिम्मेदारी

अपने आदेश में एनजीटी ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व फैसलों से नजीर दी है। कहा है कि केरवा डैम न केवल सिंचाई का आधार है, बल्कि भोपाल के लिए पेयजल का एक वैकल्पिक स्रोत भी है। पर्यावरण को बचाना राज्य की संविधानिक जिम्मेदारी है। अधिकरण ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि वे वित्तीय या प्रशासनिक कठिनाइयों का बहाना बनाकर पर्यावरण संरक्षण की अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते।


इस तरह का खतरा

जलग्रहण क्षेत्र में मिट्टी भरने और समतलीकरण से डैम की पानी रोकने की क्षमता घट रही है।

केरवा बांध कोलार, बैरागढ़ और अन्य क्षेत्रों की प्रमुख जल आपूर्ति करता है। अतिक्रमण के कारण भविष्य में भीषण जल संकट आ सकता है।

जलग्रहण क्षेत्र में में पक्के निर्माण, बंगले और रिसार्ट बनने से स्थानीय जैव विविधता नष्ट हो रही है।

नदी और नालों के प्राकृतिक बहाव रुकने से डैम तक पानी की आवक कम हो रही है।

अवैध निर्माणों से निकलने वाला मलबा और सीवेज सीधे डैम के पानी में मिल सकता है, जिससे पानी दूषित हो रहा है।

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