ईरान की तबाही से तुर्की की होगी बल्‍ले-बल्‍ले, अरब से अफ्रीका तक ‘राज’ करेंगे खलीफा एर्दोगन, बदलेगी क्षेत्र की सूरत

अंकारा: अमेरिका ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी लॉन्च करते हुए ईरान में भारी तबाही मचाई है। अमेरिका और इजरायल मिलकर उन मुख्य स्तंभों में से एक यानी ईरान को खत्म कर रहे हैं, जिस पर चार दशकों से मिडिल ईस्टर्न जियोपॉलिटिक्स का पूरा ढांचा टिका रहा है। अमेरिका-इजरायल ने सुप्रीम लीडर अली खामेनेई समेत ईरान की ज्यादातर लीडरशिप को मार दिया है और सैन्य ताकत को कमजोर किया है। ईरान के कमजोर पड़ने से तुर्की की भूमिका बढ़ सकती है,जो बहुत बड़ी स्ट्रेटेजिक अहमियत वाली जगह पर है। ईरान की तबाही से तुर्की के लिए प्रभाव बढ़ाने के नए रास्ते खुल सकते हैं।

बियॉन्ड द आइडियोलॉजिकल के मुताबिक, तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप एर्दोगन ने इस युद्ध पर संतुलित प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने अमेरिकी-इजराइली ऑपरेशन की निंदा करते हुए इसे ईरान की आजादी का उल्लंघन बताया और इस्लामिक दुनिया से लड़ाई रोकने के लिए आगे आने की अपील की। साथ ही उन्होंने खाड़ी देशों के खिलाफ ईरान के जवाबी हमलों की भी आलोचना की। एर्दोगन ने अपने विदेश मंत्री, इंटेलिजेंस चीफ और गृह मंत्री को इलाके के देशों के साथ बातचीत करने के लिए कहा है। ये दिखाता है कि मौजूदा हालात उनके लिए बहुत बड़ा मौका है।

तुर्की की कोशिश ईरान की जगह भरना

ईरान का कमजोर होना एक ऐसे बदलाव को दिखाता है, जो काफी समय से चल रहा है। दिसंबर 2024 में सीरिया में ईरान समर्थक असद शासन का गिरना इसमें अहम मोड़ था। इससे पहले लेबनान में हिजबुल्लाह के शीर्ष नेताओं का माना जाना और इराक में शिया मिलिशिया नेटवर्क कातिब हिजबुल्लाह के कमजोर होने ने ईरान को झटका दिया। बीते साल तेहरान के इन गुटों के साथ कमांड-एंड-कंट्रोल लिंक टूटे गए।तुर्की इराकी गुटों के साथ जुड़ाव गहरा करने का मौका दिख रहा है। इसमे कई गुट तुर्की के असर में दिखे हैं, खासकर कुर्दिस्तान डेमोक्रेटिक पार्टी और ईरानी मदद से निराश सुन्नी अरब ग्रुप्स की एक लाइन का रुख तुर्की की तरफ है। सीरिया में तुर्की का असर इन इराकी गुटों को हिम्मत दे रहा है। सीरिया अब बगदाद में अंकारा की स्थिति के लिए स्ट्रेटेजिक मल्टीप्लायर का काम कर रही है।

रूस भी मिडिल ईस्ट में पड़ा कमजोर

ईरान के बाद एर्दोगन के लिए दूसरा जरूरी प्लेयर रूस और उसके प्रेसिडेंट व्लादिमीर पुतिन हैं। रूस की सीरिया में मजबूत सैन्य उपस्थिति थी, जो असर सरकार कमजोर हो गई। इसके बाद अमेरिका का ऑपरेशन एपिक रूस की स्थिति और ज्यादा कमजोर कर देगा। ईरान क्षेत्र में रूस का मजबूत साथी रहा है। तेहरान के भविष्य को लेकर अब कई तरह की चिंताएं साफ दिख रही हैं।

रूस के कमजोर होने का फायदा तुर्की के पक्ष में झुक गया है। यह याद रखना चाहिए कि एर्दोगन ने रूस-यूक्रेन झगड़े में तुर्की को एक मीडिएटर के तौर पर खड़ा किया था। बात यह नहीं है कि तुर्की रूस को छोड़ेगा या नहीं। दरअसल अंकारा इतनी तेजी से असर जमा कर रहा है कि एर्दोगन को बातचीत करने के बजाय शर्तें तय करने की इजाजत मिल गई है।

तुर्की के लिए कहां-कहां मौके

ईरान में बदलाव के नतीजे मिडिल ईस्ट से कहीं आगे तक फैले हुए हैं। खासतौर से तुर्की के लिए बड़ा मौका बनता है। ऑर्गनाइजेशन ऑफ तुर्किक स्टेट (OTS) एक मजबूत जियोपॉलिटिकल ग्रुपिंग में बदल गया है। इसमें तुर्की, अजरबैजान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और उज्बेकिस्तान शामिल हैं। ईरान की कमजोरी से यह ग्रुप और मजबूत होगा।

ईरान की पैरालिसिस मिडिल कॉरिडोर के लिए नई संभावना खोलती है, जो सेंट्रल एशिया और तुर्की के जरिए चीन को यूरोप से जोड़ने वाला ट्रेड और ट्रांसपोर्ट रूट है। यह कॉरिडोर रूस और ईरान दोनों को बायपास करता है और ईरान की रुकावट की संभावना कम होने के साथ ही यह स्ट्रेटेजिक तौर पर फायदेमंद हो जाता है।

तुर्की का अफ्रीकी विस्तार

अफ्रीकी महाद्वीप में तुर्की की ग्रोथ पिछले एक दशक के सबसे अहम और कम सराहे गए जियोपॉलिटिकल डेवलपमेंट में से है। साल 2024 में तुर्की और अफ्रीकी देशों के बीच ट्रेड 37 अरब डॉलर से ज्यादा हो गया। वहीं डिफेंस एक्सपोर्ट 2025 में 10.56 अरब डॉलर हो गया, जो एक रिकॉर्ड है। तुर्की का मिलिट्री हार्डवेयर अब हॉर्न ऑफ अफ्रीका, साहेल और नॉर्थ अफ्रीका में तैनात है।

ईरान की गिरावट यहां भी मायने रखती है। तेहरान ने दशकों तक अफ्रीका में रिश्ते बनाए। एम्बेसी नेटवर्क, शिया कम्युनिटी के साथ संबंध और हथियारों के ट्रांसफर का इस्तेमाल करके वेस्ट अफ्रीका से हॉर्न तक अपनी पकड़ बनाए रखी। तुर्की एक ऐसे मॉडल के साथ इस स्पेस में आ रहा है, जो बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर और डिफेंस कोऑपरेशन के साथ इस क्षेत्र को खुद से जोड़ता है।

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