जश्न नहीं, शोक मनाने जैसा है असलम चमड़ा पर NSA की कार्रवाई! सख्ती या सिर्फ दिखावा?

भोपाल। मोहरे हैं असलम चमड़ा या शारिक मछली, अब भी सवाल कायम कि असली चेहरा कौन? भोपाल में असलम चमड़ा पर एनएसए (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) लगाने का परिणाम क्या सख्त प्रभाव छोड़ सकेगा, इसे शाकिर मछली को देख कर समझ सकते हैं, जो थोड़े दिन में जमानत पर बाहर आ चुका है। आंखें खोलकर देखिए कि कॉलेज की हिंदू छात्राओं को ड्रग्स के जाल में फंसाकर उनका यौन शोषण करने और आपत्तिजनक वीडियो बनाकर ब्लैकमेल करने का आरोपित शारिक मछली भी भोपाल में आजाद घूम रहा है।

शारिक अहमद को शारिक मछली बनाने की कहानी हो या असलम कुरैशी को असलम चमड़ा की पहचान देना, जरूरी है कि पहले तलाश इसके पीछे छिपे चेहरे की होना ही चाहिए। वो कौन राजनेता हैं, जिनका संरक्षण ऐसे दुर्दांत अपराधियों को हासिल है, सभी जानते हैं।

भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित होंगी ऐसी घटनाएं

असलम चमड़ा एक दिन पहले ही जमानत पर रिहा हुआ था। हिंदू संगठनों का विरोध और गौ माता के प्रति अपनी आस्था दिखाते हुए असलम पर एनएसए की कार्रवाई से तात्कालिक रूप से जनाक्रोश रोका तो जा सकता है, लेकिन दीर्घकालिक रूप से ऐसी घटनाएं भाजपा के लिए बेहद नुकसानदेह साबित होंगी, क्योंकि जनता देख रही है कि कौन किसका रहनुमा बना हुआ है। समय आने पर जनता का आक्रोश रोक पाना किसी के बूते की बात नहीं रह जाएगी।

प्रियंक कानूनगो का चौंकाने वाला बयान

संघ की पाठशाला से निकले और अब संवैधानिक पद पर बैठे प्रियंक कानूनगो का बयान चौकाने वाला है। उनके अनुसार, असलम चमड़ा ही 250 रोहिंग्या को भोपाल लाया और उनसे गौ हत्या करवाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बीफ की तस्करी कर रहा था। बात में दम है।

असलम चमड़ा और शारिक मछली का नहीं बिगाड़ पा रही सरकार

भोपाल का स्लाटर हाउस नगर निगम की मेहरबानी से असलम चमड़ा के पास ही था। उसके पास तो मृत पशुओं को उठाने और कारकस प्लांट व उनसे वसा निकालने के लिए रेंडरिंग प्लांट का ठेका भी था। सभी जानते हैं कि पहले दिन से ही महापौर मालती राय दिखावटी चेहरा रही हैं, जबकि नगर निगम का असली संचालक कोई और है। यही वजह है कि शारिक मछली हो या असलम चमड़ा, दोनों का सरकार कुछ नहीं बिगाड़ पा रही है।

सरकार के पास इच्छाशक्ति की कमी

  • दोनों दुर्दांत को पुलिस का संरक्षण भी किसी से छिपा नहीं है। असलम पर स्लाटर हाउस में लगभग 26 टन गोमांस की अवैध तस्करी और भंडारण के आरोप हैं। जांच में इसके अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन (अरब देशों और चीन) का भी राजफाश हुआ था। ये एक अपराध ही नहीं, हमारी व्यवस्था के गाल पर करारा तमाचा है। जमानत मिलने के तुरंत बाद एनएसए लगाना यह दर्शाता है कि पुलिस के पास पहले से पर्याप्त आधार थे, कमी इच्छाशक्ति की थी।
  • चौंकिएगा नहीं, कुछ दिनों में असलम भोपाल की झील किनारे घूमता हुआ दिख जाएगा, क्योंकि हमारी व्यवस्था में अब केवल भांग ही भांग बची है। विचार कीजिए, जब सेशन कोर्ट में कमजोर पैरवी के कारण जमानत मिल सकती है, तो बड़ी अदालत में दमदार पैरवी का दावा कौन कर सकता है। हाई कोर्ट ही सरकारी वकीलों की योग्यता पर प्रश्न उठा रहा है, ऐसे में असलम चमड़ा पर एनएसए की कार्रवाई पर जश्न न मनाइये, यह शोक मनाने जैसा ही है।
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