बांधवगढ़ में बाघ की मौत पर बढ़ा सस्पेंस, डिहाइड्रेशन और ट्रैंक्यूलाइज दवा का ओवरडोज बना शक की बड़ी वजह

 भोपाल। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में ग्रामीण महिला पर हमले के बाद मारे गए बाघ की मौत अब रहस्य बनती जा रही है। शुरुआती जांच में जहां बाघ को ट्रैंक्यूलाइज करने के दौरान दी गई बेहोशी की दवा को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि भीषण गर्मी और डिहाइड्रेशन की स्थिति में दवा का अधिक डोज बाघ की मौत का कारण बन सकता है। मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने भी निगरानी बढ़ा दी है और बाघ के शव का दोबारा परीक्षण कराया गया है।

डिहाइड्रेशन में ट्रैंक्यूलाइज करना पड़ सकता है भारी

  • वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार ट्रैंक्यूलाइज करने के लिए उपयोग की जाने वाली जायलोजिन जैसी दवाओं की मात्रा बाघ के वजन, स्वास्थ्य और मौसम की स्थिति को देखकर तय की जाती है। यदि बाघ पहले से भूखा-प्यासा, तनावग्रस्त या गंभीर रूप से डिहाइड्रेट हो, तो दवा का असर घातक हो सकता है। ऐसी स्थिति में ब्लड प्रेशर और सांस लेने की गति अचानक धीमी पड़ जाती है, जिससे मौत की आशंका बढ़ जाती है।
  • वन्यजीव विशेषज्ञ डा. सुदेश बाघमारे का कहना है कि अत्यधिक गर्मी में बाघों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। साइबेरियाई मूल के बाघों ने भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढाल तो लिया है, लेकिन वे भीषण गर्मी अधिक समय तक सहन नहीं कर पाते।

मुख्य वन्यप्राणी अभिरक्षक ने कही अलग बात

  • मुख्य वन्यप्राणी अभिरक्षक डा. समीता राजौरा ने स्पष्ट किया कि जब चिकित्सकों ने बाघ को ट्रैंक्यूलाइज करने के लिए डार्ट मारा, तब तक उसमें कोई हलचल नहीं थी। प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि बाघ संभवत: बेहोशी की दवा लगने से पहले ही दम तोड़ चुका था।
  • उन्होंने बताया कि मौत के वास्तविक कारणों का पता पोस्टमार्टम, फोरेंसिक जांच और विसरा रिपोर्ट आने के बाद ही चल सकेगा।

एनटीसीए की निगरानी में दोबारा परीक्षण

मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए एनटीसीए के निर्देश पर जबलपुर में बाघ के शव का पुन: परीक्षण कराया गया। इस दौरान एसडब्ल्यूएफएच जबलपुर, मुकुंदपुर और डब्ल्यूसीटी के विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों की टीम ने शव के करीब 15 अंगों के नमूने एकत्र किए। पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी भी कराई गई है।

जल संकट बढ़ा रहा बाघ-मानव संघर्ष

विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में बढ़ते जल संकट के कारण वन्यजीव आबादी वाले क्षेत्रों की ओर आ रहे हैं। बांधवगढ़ और कान्हा जैसे टाइगर रिजर्व में प्राकृतिक जल स्रोत तेजी से सूख रहे हैं। आरोप है कि वन विभाग कृत्रिम जल स्रोतों में पर्याप्त पानी उपलब्ध कराने में नाकाम रहा है। यही वजह है कि बाघ पानी की तलाश में गांवों तक पहुंच रहे हैं और मानव-बाघ संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं।

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