भोपाल की महिलाओं ने साइकिलिंग से गढ़ी सफलता साहस और सशक्तीकरण की मिसाल

भोपाल। साइकिल अब केवल एक परिवहन साधन नहीं रह गई है, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली, पर्यावरण संरक्षण और आत्मविश्वास का प्रतीक बन चुकी है। विश्व साइकिल दिवस के अवसर पर भोपाल के ऐसे साइकिल प्रेमियों की कहानियां सामने आती हैं जिन्होंने साइकिलिंग को शौक से आगे बढ़ाकर अपनी पहचान बना लिया।

किसी ने घरेलू जिम्मेदारियों के बीच खुद को नई पहचान दी, किसी ने हजारों किलोमीटर की यात्राओं से महिला सशक्तिकरण और राष्ट्रभक्ति का संदेश दिया, तो किसी ने दैनिक आवागमन से शुरुआत कर देश की अग्रणी अल्ट्रा साइकिलिस्टों में स्थान बनाया।

टीला जमालपुरा निवासी 47 वर्षीय माया तिवारी पिछले तीन वर्षों से नियमित साइकिलिंग कर रही हैं। गृहिणी होने के बावजूद उन्होंने अपने दिन की शुरुआत साइकिलिंग से करने की आदत बनाई और आज प्रतिदिन 40 से 50 किलोमीटर तक साइकिल चलाती हैं। अब तक वह 120 किलोमीटर की लंबी सवारी पूरी कर चुकी हैं तथा इस वर्ष लगभग 6 हजार किलोमीटर की दूरी तय कर चुकी हैं।

भोपाल साइकिल किंग 2026 में प्रथम उपविजेता रहने के साथ उन्होंने इंडियन साइक्लिस्ट क्वीन 2026 का पदक भी हासिल किया है। माया का मानना है कि नियमित साइकिलिंग हृदय स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और वजन नियंत्रण के लिए बेहद लाभकारी है तथा यह हर आयु वर्ग के लोगों को अपनानी चाहिए।

आशा 64 हजार किलोमीटर से अधिक की साइकिल यात्रा पूरी कर चुकी हैं

भोपाल की 26 वर्षीय आशा मालवीय ने साइकिलिंग को साहस, राष्ट्रसेवा और महिला सशक्तिकरण का माध्यम बनाया है। राष्ट्रीय स्तर की एंड्योरेंस साइकिलिस्ट, पर्वतारोही और राष्ट्रीय अभिलेख धारक आशा इस समय भारतीय सेना दिवस के उपलक्ष्य में जयपुर से अरुणाचल प्रदेश के कीब्तू तक लगभग 7,800 किलोमीटर की साइकिल यात्रा पर हैं। वह अब तक 7,400 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय कर चुकी हैं।

नाथूला दर्रे जैसे दुर्गम क्षेत्रों तक साइकिल पहुंचाकर उन्होंने अदम्य साहस का परिचय दिया है। विभिन्न अभियानों के माध्यम से आशा 64 हजार किलोमीटर से अधिक की साइकिल यात्रा पूरी कर चुकी हैं और युवाओं, विशेषकर युवतियों को अपने सपनों का साहसपूर्वक पीछा करने के लिए प्रेरित कर रही हैं।

यातायात की समस्या से बचने के लिए शुरू हुई साइकिलिंग बना जीवन का हिस्सा

मौलाना आजाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान की सहायक प्राध्यापक डॉ. प्रगति अग्रवाल की साइकिलिंग यात्रा भी कम प्रेरणादायक नहीं है। वर्ष 2013 में बेंगलुरु में यातायात की समस्या से बचने के लिए शुरू हुई साइकिलिंग आज उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। उन्होंने लद्दाख में आयोजित ग्रेट हिमालयन अल्ट्रा की 600 किलोमीटर श्रेणी पूरी कर विशेष पहचान बनाई, जहां वह यह उपलब्धि हासिल करने वाली एकमात्र महिला प्रतिभागी रहीं।

इसके अलावा 200, 400 और 600 किलोमीटर की ब्रेवेट प्रतियोगिताएं पूरी कर उन्होंने सुपर रैंडोन्योर का सम्मान प्राप्त किया। डॉ. अग्रवाल का कहना है कि साइकिलिंग केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, अनुशासन और धैर्य को भी मजबूत बनाती है।

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