बिजनेस चलाने के लिए दूसरों को बेवकूफ बनाना जरूरी

भोपाल, एमपी के प्रसिद्ध उद्योगपति और दिलीप बिल्डकॉन लिमिटेड के एमडी दिलीप सूर्यवंशी ने एसपीएस के ईशान तिवारी, एसपीएस की नव्या जैन, कैंपियन स्कूल के ग्रंथ बोहरे, आईईएस पब्लिक स्कूल के शान अली और सेंट जोसेफ कॉन्वेंट स्कूल की कृषिता सिंह के साथ बाल पंचायत में बच्चों के सवालों के जवाब दिए।

सवाल: आपने सिविल इंजीनियरिंग की थी, फिर बिजनेस में कैसे आ गए? दिलीप सूर्यवंशी- मैं 1967-68 में शाहजहांनाबाद पुलिस लाइन में रहता था। पापा पुलिस विभाग में थे। कुछ साल कोपल स्कूल में पढ़ाई की। उस वक्त पानी के बर्तनों में काई जम जाती थी। गजक पर मक्खियां भिनभिनाती थीं। सब कुछ बहुत साधारण लेकिन सच्चा था।

10वीं में जब नंबर कम आए तो सबने कहा कि बीए करा दो, इससे ज्यादा कुछ नहीं कर पाएगा। तब मां ने कहा- इज्जत का सवाल है, पढ़ लो। उनकी बात ने मुझे झकझोर दिया और फिर मैंने खूब मेहनत की।

जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज की सिविल ब्रांच में एडमिशन मिला, जो उस समय की टॉप ब्रांच मानी जाती थी। पिताजी टीआई थे, इसलिए अक्सर छोटे कस्बों में ट्रांसफर होता रहता था। इन बार-बार के तबादलों से मां बहुत परेशान हो जाती थीं। शायद इसी वजह से उन्होंने बचपन से ही हमें समझाया कि “नौकरी मत करना।” उनकी एक बात हमेशा याद रही कि शेर की पूंछ बनने से अच्छा है, गधे का सिर बन जाओ।”

सवाल: बिजनेस में सफलता पाने का फॉर्मूला क्या है? दिलीप सूर्यवंशी- हौसला, हिम्मत और साहस हमेशा बनाए रखो। याद रखो, कभी भी कोई प्रोडक्ट फेल नहीं होता। असफल होता है तो सिर्फ मैनेजमेंट। बिजनेस में सफलता का एक ही फॉर्मूला है। हर दिन खुद से अपॉइंटमेंट लो, सेल्फ-एनालिसिस करो और अपना डीएनए पहचानो कि तुम्हारी असली स्किल क्या है, किस काम में तुम सबसे बेहतर हो। फिर उसी स्किल से जुड़ा बिजनेस खड़ा करो।

उतार-चढ़ाव तो आते रहेंगे, लेकिन जैसे हम फ्लाइट में टर्बुलेंस आने पर प्लेन नहीं बदलते, वैसे ही मुश्किल वक्त में धैर्य रखो और गुजर जाने का इंतजार करो। मैं जब पहली बार पिता बना, तब मिठाई बांटने के लिए मेरे पास 200 रुपए भी नहीं थे।

दोस्त से उधार लेकर मिठाई खिलाई। शुरुआत में कई असफलताएं मिलीं, लेकिन हर गलती से कुछ न कुछ सीखता रहा। याद रखो, फोकस बढ़ाओ, क्योंकि युद्ध के समय सैनिक लाशें नहीं गिनते, वे बस जीत पर ध्यान रखते हैं।

सवाल: कोई ऐसा बचपन का किस्सा, जो याद करके आप आज भी हंस देते हों? दिलीप सूर्यवंशी- हां, जब मैं छोटा था। हमारे पड़ोस में एक आंटी थीं, जिन्हें लोगों की बुराइयां सुनने में बहुत मजा आता था। मुझे यह बात पता लग गई तो मैं गया और एक दिन उनसे बहुत इमोशनल होकर बोला कि आपको पता है, ये लोग मेरे असली मां-बाप नहीं हैं।

मेरे साथ सौतेले जैसा बर्ताव करते हैं, बहुत डांटते हैं। वो मम्मी-पापा की बुराइयां सुनने के लिए मुझे रोज अपने पास बुला लेतीं। बढ़िया पकौड़े, पोहे और तरह-तरह के नाश्ते पुचकार कर खिलातीं। कई दिनों तक मैंने खूब मौज काटी। फिर एक दिन वो मम्मी-पापा से मिल लिए और सारी पोल-पट्टी खुल गई कि मैं ऐसा ही ड्रामेबाज हूं।

सवाल: क्या बिजनेस चलाने के लिए दूसरों को बेवकूफ बनाना जरूरी है? दिलीप सूर्यवंशी- अरे ऐसा बिल्कुल नहीं है। बिजनेस में आपको हर वक्त हाई अलर्ट में रहना होता है। मतलबी लोगों से बचना होगा और खुद को इतना स्मार्ट बनाना होगा कि आपको कोई बेवकूफ न बना सके। पूरी दुनिया चालबाज या धोखेबाज है। बच्चों को कभी ऐसा रेडीमेड माइंडसेट नहीं देना चाहिए। ऐसी बात विचारों में बैठ जाती है तो लोग ग्रो करना पसंद कर लेते हैं। हमें किसी मोबाइल सॉफ्टवेयर की तरह खुद की पर्सनालिटी को भी हर वक्त अपडेट करते रहना चाहिए।

सवाल: कोई ऐसी चीज है, जो पैसों से नहीं खरीदी जा सकती? दिलीप सूर्यवंशी- लोगों की दुआएं और वफादारी… यह सब सिर्फ कमानी पड़ती है, खरीदी नहीं जा सकती। हमेशा अपनी मां का आशीर्वाद अपने साथ लेकर चलिए। वो साथ रहा तो एक का एक हजार मिलेगा। केवल वही रिश्ता है, जो आपको बिना एक्सपेक्टेशन प्यार देता है।

उनको कभी शेम फील न करवाएं। आजकल बच्चे हर वक्त मोबाइल से ही चिपके रहते हैं। टेक्नोलॉजी का खूब उपयोग करिए मगर लंच और डिनर के समय दो घंटे मोबाइल फास्टिंग जरूर करिए और इस दौरान अपने पेरेंट्स से बात करना शुरू करें।

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