ईरान का टोल वसूली का प्‍लान अंतरराष्‍ट्रीय कानूनों के खिलाफ, न‍ियम जान लीजिए, भारत का रुख

नई दिल्‍ली: अमेरिका और ईरान ने दो हफ्ते के टेम्पररी सीजफायर का ऐलान किया है। हालांकि, इसी के साथ एक नया मुद्दा सामने आ गया है। तेहरान होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलने की कोशिश शुरू की है। यह एक ऐसा प्रपोजल है जो ग्लोबल ट्रेड फ्लो को रोक सकता है। इससे एनर्जी मार्केट में नई अनिश्चितता पैदा हो सकती है। सवाल यह है कि इसे लेकर अंतरराष्‍ट्रीय कानून क्‍या हैं। आइए, यहां इस पूरे पहलू को समझते हैं।

होर्मुज स्ट्रेट क्यों जरूरी है?

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे जरूरी समुद्री चोकपॉइंट्स में से एक है। यह बात भौगोलिक और आर्थिक दोनों तरह से लागू होती है। अपने सबसे पतले हिस्से में यह लगभग 34 किमी चौड़ा है। फिर भी दुनिया की तेल सप्लाई का लगभग पांचवां हिस्सा यहां से गुजरता है। यह वॉटरवे खाड़ी के तेल बनाने वाले देशों को हिंद महासागर के जरिए ग्लोबल मार्केट से जोड़ने वाले मुख्य रास्ते के तौर पर काम करता है।

क्रूड ऑयल के अलावा लिक्‍व‍िफाइड नैचुरल गैस और फर्टिलाइजर जैसी जरूरी चीजें भी इसी कॉरिडोर से गुजरती हैं। इससे यह ग्लोबल ट्रेड के लिए जरूरी हो जाता है। पानी के इस पतले हिस्से में किसी भी रुकावट का एनर्जी मार्केट पर तुरंत असर पड़ता है। इससे अक्सर कीमतें बढ़ जाती हैं। दुनिया भर में सप्लाई की चिंताएं पैदा होती हैं।

ईरान क्या प्रस्‍ताव कर रहा है?

ईरान अब हफ्तों की लड़ाई के बाद एक बड़ी जियोपॉलिटिकल स्ट्रैटेजी के तहत स्ट्रेट पर अपना कंट्रोल फॉर्मल बनाने की कोशिश कर रहा है। एक संभावित लंबे समय के शांति समझौते से जुड़े अपने प्रस्तावों के हिस्से के तौर पर तेहरान चाहता है कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों के लिए ट्रांजिट फीस चार्ज करने का अधिकार हो।

अधिकारियों के मुताबिक, ये चार्ज फिक्स नहीं होंगे, बल्कि जहाज के टाइप, उसके कार्गो के नेचर और मौजूदा हालात के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान एक ऐसे फ्रेमवर्क पर भी काम कर रहा है जिसके तहत जहाजों को गुजरने की इजाजत देने से पहले परमिट या लाइसेंस लेने की जरूरत हो सकती है। यह काम ओमान को शामिल करने वाले रीजनल सिस्टम के साथ कोऑर्डिनेशन में किया जाएगा।

ईरान के डिप्टी विदेश मंत्री काजम गरीबाबादी ने पिछले हफ्ते कहा था कि देश की पार्लियामेंट पहले से ही एक बिल का ड्राफ्ट बना रही है जो ऐसे सिस्टम को कानूनी मदद देगा। इससे पता चलता है कि यह कदम सिर्फ बयानबाजी नहीं है। इसके बजाय स्ट्रेट से ट्रैफिक को रेगुलेट और मोनेटाइज करने के एक स्ट्रक्चर्ड प्लान का हिस्सा है।

अब तक क्या हुआ है?

जब से लड़ाई शुरू हुई है, ईरान ने स्ट्रेट पर अपनी पकड़ काफी मजबूत कर ली है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने समुद्री आवाजाही पर रोक लगा दी है। सिर्फ कुछ ही जहाजों को गुजरने दिया है।

ऐसे मामले सामने आए हैं जब जहाजों पर गोली चलाई गई या उन्हें चेतावनी दी गई। इससे ट्रैफिक में तेजी से गिरावट आई। शिपिंग एक्टिविटी बहुत ज्‍यादा रुकी हुई है। सिर्फ कुछ ही जहाज इस रास्ते से सफलतापूर्वक गुजर रहे हैं। ये अक्सर ईरान या उसके सहयोगी देशों से जुड़े होते हैं।
ऐसी भी रिपोर्टें आई हैं जिनसे पता चलता है कि कुछ जहाजों ने सुरक्षित रास्ता पाने के लिए बड़ी रकम का पेमेंट किया होगा। शायद लाखों डॉलर का। इस रुकावट की वजह से पहले ही दुनिया भर में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव आया है। ये सीजफायर की उम्मीदों पर पानी फिरने से पहले तेजी से बढ़ गई थीं।

अंतरराष्‍ट्रीय कानून क्या कहता है?

ईरान के प्रस्ताव की कानूनी वैधता पर इंटरनेशनल समुद्री कानून के तहत काफी सवाल हैं। यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ द सी (UNCLOS) साफ तौर पर कहता है कि इंटरनेशनल नेविगेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले स्ट्रेट को बिना रुकावट के आने-जाने की इजाजत देनी चाहिए। UNCLOS दुनिया भर के समुद्री नियमों को कंट्रोल करता है।

इस फ्रेमवर्क के तहत ऐसे स्ट्रेट से सटे देश सिर्फ जहाजों को गुजरने देने के लिए फीस नहीं लगा सकते। उन्हें सिर्फ खास सर्विस, जैसे पायलटिंग या टग असिस्टेंस के लिए ही चार्ज लगाने की इजाजत है। उन्हें भी बिना किसी भेदभाव के एक जैसा लागू किया जाना चाहिए। इस तरह ईरान जैसा आम ट्रांजिट टोल प्रपोज कर रहा है, वह बड़े पैमाने पर माने जाने वाले इंटरनेशनल नियमों के खिलाफ होगा।

हालांकि, ऐसे कानूनों को लागू करना मुश्किल बना हुआ है। खासकर इसलिए क्योंकि न तो ईरान और न ही अमेरिका ने UNCLOS को औपचारिक रूप से मंजूरी दी है। भले ही दोनों ने ऐतिहासिक रूप से इसके सिद्धांतों का पालन किया है।

लागू करना मुश्किल क्यों है?

समुद्री इलाकों में इंटरनेशनल कानून ज्‍यादातर आम सहमति और सहयोग पर निर्भर करता है, न कि सख्‍त लागू करने के तरीकों पर। जबकि 170 से ज्‍यादा देशों ने UNCLOS को मंजूरी दी है, इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि देश इसका पालन करना चुनते हैं या नहीं।

एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि ईरान का टोल लगाने का कोई भी कदम समुद्र में मौजूदा ग्लोबल ऑर्डर को चुनौती दे सकता है। अगर ऐसी मिसाल कायम होती है तो समुद्री इलाकों के जरूरी चोकपॉइंट को कंट्रोल करने वाले दूसरे देश भी ऐसा ही करने के लिए ललचा सकते हैं। इससे शायद फ्री नेविगेशन के तय नियम टूट सकते हैं।

स्थिति इस बात से और भी मुश्किल हो जाती है कि फ्री पैसेज लागू करने के लिए मिलिट्री ऑप्शन मुश्किल और रिस्की होंगे।स्ट्रेट की ज्योग्राफी, इसकी पतली गलियों और ईरान के पहाड़ी कोस्टलाइन के साथ तेहरान को एक स्ट्रेटेजिक एडवांटेज देती है। इससे वह इनलैंड पोजीशन से जहाजों को टारगेट कर सकता है।

भारत का क्‍या है स्‍टैंड?

इस प्रपोजल पर दुनिया भर से कड़ी प्रतिक्रियाएं आई हैं। अमेरिका ने यह साफ कर दिया है कि ईरान के साथ किसी भी एग्रीमेंट में स्ट्रेट के जरिए तेल का फ्री फ्लो नॉन-नेगोशिएबल रहना चाहिए।

गल्फ देश अपने एनर्जी एक्सपोर्ट के लिए इस रूट पर बहुत ज्‍यादा डिपेंड करते हैं। उन्‍होंने भी चिंता जताई है। संयुक्त अरब अमीरात ने कहा है कि इस जलमार्ग को कोई भी एक देश नियंत्रित नहीं कर सकता या बंधक नहीं बना सकता। जबकि कतर ने जोर देकर कहा है कि सभी देशों को इस स्‍ट्रेट से होकर गुजरने का पूरा अधिकार है।

भारत ने भी टोल लगाने के विचार को खारिज कर दिया है। उसने ऐसे दावों को बेबुनियाद बताया है। दोहराया है कि अंतरराष्ट्रीय नियम-कानून इस तरह के शुल्क लगाने की इजाजत नहीं देते।


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