अमेरिका-ईरान की जंग में मध्यस्थ बनना क्या पाकिस्तान की जीत है, भारत के लिए क्या हैं मायने? एक्सपर्ट से समझें

इस्लामाबाद: अमेरिका और ईरान में टकराव रोकने के लिए पाकिस्तान एक मध्यस्थ के रूप में सामने आया है। रिपोर्ट बताती हैं कि इस सप्ताह के आखिर में अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में आमने-सामने की बैठक हो सकती है। एक्सियोस के रिपोर्टर बराक रेविड ने एक्स पर पोस्ट में एक इजरायली अधिकारी के हवाले से यह जानकारी दी है। इस्लामाबाद में होने वाली बैठक में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अमेरिकी प्रततिनिधिमंडल का नेतृत्व कर सकती है। हालांकि, यह पहले से ही अंदाजा लगाया जा रहा था कि पाकिस्तान मध्यस्थता में शामिल हो सकता है लेकिन अब साफ हो गया है। ऐसे में भारत पर इसका असर पड़ सकता है।

पाकिस्तान का मध्यस्थ के रूप में सामने आना भारत के लिए चिंता की बात है। खासतौर पर जब ईरान पर हमले से ठीक पहले भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजरायल का दौरा किया था। ऐसे में यह लग सकता है कि भारत ने भले ही एक पक्ष का चुना लेकिन उस पक्ष ने भारत को नहीं चुना है।

पाकिस्तान की मध्यस्थता पर बोले एक्सपर्ट

दक्षिण एशिया मामलों के अमेरिकी एक्सपर्ट माइकल कुगलमैन ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान का मध्यस्थ बनना हैरानी वाली बात नहीं है। पिछले एक साल में पाकिस्तान और ईरान के बीच कई उच्च स्तरीय बैठकें हुए हैं। अमेरिका का ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान को पसंद करता है। ट्रंप ने कहा है कि मुनीर ईरान को ज्यादातर लोगों से बेहतर जानते हैं। कुगलमैन ने आगे कहा कि ध्यान देने लायक बात है कि पाकिस्तान अमेरिका में ईरान के राजनयिक हितों का प्रतिनिधित्व करता है।

पाकिस्तान को मध्यस्थता से फायदा

लंदन यूनिर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ पॉलिटिक्स एंड इंटरनेशल स्टडीज में प्रोफेसर अविनाश पालीवाल का कहना है कि पाकिस्तान इस स्थिति का कब तक फायदा उठा पाएगा यह कहना मुश्किल है, लेकिन अभी के लिए उसने अपनी गुंजाइश बढ़ा ली है। उन्होंने एक्स पर लिखा कि पाकिस्तान ने आगे के लिए ईरान में अपने हितों को सुरक्षित कर लिया है। लेकिन इसके साथ ही पाकिस्तान के लिए एक अजीब स्थिति खड़ी हो गई है। यह स्थिति इजरायल को लेकर है, जो ईरान युद्ध में एक अहम पक्ष है और उसके बिना कोई समझौता नहीं होना है। अभी तक दोनों पक्षों के बीच औपचारिक संपर्क नहीं था, लेकिन अब तेल अवीव के पास इस्लामाबाद से जुड़ने का एक कारण है।

भारत के लिए क्या हैं मायने?

वहीं, भारत को इस बारे में फिर से सोचना होगा कि वह ईरान के साथ संबंधों को कैसे परिभाषित करता है। इसकी वजह है कि ईरान अभी तक टूटा नहीं है और होर्मुज स्ट्रेट में भारत के हितों को सुरक्षित रखने के लिए तेहरान से संपर्क जरूरी है। भारत को एक बार फिर लोगों से लोगों के बीच संबंधों को मजबूत करने पर काम शुरू करना चाहिए।

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