ग्रामीण सेवा के लिए बांड भरने की आवश्यकता नहीं, हाई कोर्ट ने स्नातकोत्तर इनसर्विस डॉक्टरों के हक में सुनाया आदेश

जबलपुर। हाई कोर्ट के प्रशासनिक न्यायाधीश विवेक रूसिया व न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में साफ किया कि राज्य सरकार की सेवा में कार्यरत यानी इनसर्विस डाक्टरों को मेडिकल स्नातकोत्तर कोर्स पूरा करने के बाद ग्रामीण सेवा के लिए बांड भरने की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने कहा कि मध्य प्रदेश स्वायत्त मेडिकल व दंत स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम, डिग्री-डिप्लोमा प्रवेश नियम, 2017 का नियम 11 इन-सर्विस डाक्टरों पर लागू नहीं होता। नियम-11 की व्याख्या करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि यह प्रविधान चयनित अभ्यर्थियों पर लागू होता है, लेकिन उन पर नहीं जो पहले से सरकारी सेवा में हैं।

डा. दीपाली बैरवा ने याचिका दायर कर बताया कि उन्होंने भोपाल के डायरेक्टर मेडिकल एजुकेशन के समक्ष ग्रामीण सेवा से जुड़े बांड से मुक्त किए जाने और उनके मूल शैक्षणिक प्रमाण-पत्र लौटाने की मांग की थी। याचिकाकर्ता ने मार्च 2017 में एनेस्थीसिया में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा पूरा किया था। उसके बाद उन्हें मध्य प्रदेश मेडिकल साइंस यूनिवर्सिटी, जबलपुर द्वारा प्रमाण-पत्र जारी किया गया और जुलाई 2017 में उन्होंने मेडिकल काउंसिल में रजिस्ट्रेशन कराया।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि पीजी डिप्लोमा का परिणाम घोषित होने के तीन महीने के भीतर उन्हें ग्रामीण पदस्थापना का कोई आदेश जारी नहीं किया गया, इसलिए नियमों के अनुसार उन्हें बांड की शर्तों से मुक्त किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि प्री-पीजी नियम, 2014 के तहत यदि तीन महीने की अवधि में ग्रामीण सेवा का नियुक्ति आदेश जारी नहीं होता है तो बांड स्वतः निरस्त माना जाता है। वहीं राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि याचिकाकर्ता के मूल प्रमाण-पत्र पहले ही अगस्त 2017 में एक अंतरिम आदेश के अनुपालन में लौटा दिए गए। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता को जो अनापत्ति प्रमाण-पत्र दिया गया, उसमें स्पष्ट शर्त थी कि सुपर स्पेशियलिटी-पीजी पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद उन्हें एक वर्ष की अनिवार्य ग्रामीण सेवा करनी होगी।

याचिकाकर्ता को दिसंबर 2016 में रतलाम में मेडिकल ऑफिसर के रूप में नियुक्त किया गया और पीजी डिप्लोमा के दौरान वह पहले से ही सरकारी सेवा में थीं। आगे की पढ़ाई के लिए अनुमति मिलने से पहले ही याचिकाकर्ता बिना स्वीकृति के अवकाश पर चली गईं। एमजी मेडिकल कालेज, इंदौर द्वारा जारी एनओसी में मूल प्रमाण-पत्र लौटाते समय यह शर्त रखी गई कि याचिकाकर्ता एक वर्ष की ग्रामीण सेवा पूरी करेंगी। साथ ही कोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में यह महत्वपूर्ण तथ्य छिपाया कि वह पहले से ही रतलाम में मेडिकल आफिसर के रूप में नियुक्त थीं। कोर्ट ने कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता ने तथ्य छिपाकर याचिका दायर की है। इस मत के साथ याचिका निरस्त कर दी।

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