पश्चिमी यूपी में भाजपा की अंदरूनी कलह से विपक्ष हुआ मजबूत 

लखनऊ। लोकसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान शुक्रवार 19 अप्रैल को होने जा रहा है, ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सियासी पारा भी चढ़ गया है। एक तरफ जहां भाजपा की अंदरुनी कलह प्रत्याशियों की जीत पर बैरियर का काम करती दिख रही है तो वहीं जातिगत समीकरण भी नेताओं को परेशान करने वाले हैं। मुसलमान, अजा समुदाय और अब राजपूत विद्रोह ने भाजपा की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। 
दरअसल प्रदेश बीजेपी के प्रमुख चेहरे संगीत सोम और संजीव बालियान जातिगत समीकरण के फेर में उलझते नजर आए हैं। इस पर केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला की समुदाय विशेष पर की गई टिप्पणी ने राजपूत विद्रोह को सामने लाने का काम किया, जो अब सुर्खियों में है। इस प्रकार मुसलमान और अनुसूचित जाति के बाद, राजपूत समुदाय भी भाजपा से नाराज हो गया है। राजपूत समुदाय पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ा समुदाय है, इसलिए भी यह मामला सुर्खियों में बना हुआ है। यदि इस मामले में जल्द कोई रास्ता नहीं निकाला जाता है तो भाजपा को इसका खासा नुक्सान हो सकता है। आंकड़ों के मुताबिक पश्चिमी यूपी में राजपूतों की दर 10 फीसदी बैठती है, ऐसे में ये चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इनके प्रभावी क्षेत्रों में आगरा और फतहपुर सीकरी के साथ ही गौतमबुद्ध नगर, गाजियाबाद, सहारनपुर, मेरठ, कैराना, मुजफ्फरनगर, बागपत, बिजनोर, नगीना, अमरोहा, मोरादाबाद, संभल, अलीगढ़, हाथरस, मथुरा प्रमुख हैं। अब चूंकि राजपूत समुदाय वर्षों से बीजेपी सपोटर माना जाता रहा है, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में केवल एक सीट के साथ पार्टी टिकट में हिस्सेदारी ऐतिहासिक रूप से कम कर दी गई। पारंपरिक राजपूत सीट गाजियाबाद से जनरल (सेवानिवृत्त) वीके सिंह को टिकट नहीं मिलना जहां नाराजगी का कारण रहा है, वहीं एके गर्ग को टिकट दिए जाने से भी राजपूत समुदाय खुद को छला महसूस कर रहा है। 
हद ये है कि अब दोनों ही नेता यानी सोम और बालियान एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हैं और एक दूसरे के खिलाफ बयान दे रहे हैं। बालियान कहते हैं कि पार्टी सब देख रही है कि कौन क्या कह रहा। चुनाव बाद पार्टी फैसला लेगी। दूसरी तरफ सोम कहते हैं कि मुझे नहीं पता कि बालियान कौन है। कहा तो यह भी जा रहा है कि मेरठ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात के बाद ये नेता नरम पड़ गए हैं और आगे इस तरह का कोई बयान या काम नहीं करेंगे, जिससे पार्टी को नुक्सान हो। एक चुनावी अनुमान के मुताबिक, मुजफ्फरनगर में जाटों की संख्या के बराबर राजपूत आठ प्रतिशत से अधिक हैं, और अगर वे चुनाव के दौरान भाजपा का बहिष्कार करना चुनते हैं तो वे खेल बिगाड़ सकते हैं। वैसे भी कहा जा रहा है कि कुछ सीट को छोड़कर राजपूत भाजपा के खिलाफ जा रहे हैं, जिसके लिए कहीं न कहीं भाजपा की अंदरुनी कलह को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। 

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