कुणाल कामरा और मुनव्वर फारुकी पर बोले पदमश्री अशोक चक्रधर:मंच कोई भी हो मर्यादा जरूरी

कॉमेडियन कुणाल कामरा और मुनव्वर फारुखी को लेकर हाल ही में कई विवाद सामने आए हैं। इनको लेकर पद्मश्री व्यंग्यकार डॉ. अशोक चक्रधर ने कहा कि मंच चाहे व्यंग्य का हो या हास्य का, मर्यादा सबसे जरूरी है। उनका मानना है कि जो बातें बेडरूम तक सीमित रहनी चाहिए, उन्हें सोशल मीडिया या सार्वजनिक मंचों पर नहीं लाना चाहिए।

वे कहते हैं कि व्यंग्य की परंपरा प्राचीन है, लेकिन सोशल मीडिया के खुले मंच पर संयम बनाए रखना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है। बता दें कि अशोक चक्रधर भोपाल में दो दिवसीय कार्यक्रम जश्न-ए-अदब, साहित्य उत्सव सांस्कृतिक कारवां में शामिल होने के लिए पहुंचे थे।

अशोक चक्रधर ने कहा कि मर्यादा तोड़ना सदैव गलत है। व्यंग्य करते समय संयम जरूरी है। बनारस में होली पर कवि सम्मेलन की छूट होती थी, वहां एक दिन के लिए अश्लीलतम बोल सकते थे। पर ये जानते हुए कि वह सीमित दायरे में रहेगा। सोशल मीडिया पर सबके लिए खुला मंच है, इसलिए मर्यादा का पालन और जरूरी हो जाता है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने जनता की ओर से ‘भारतेंदु’ नाम पाया।

बोले- संभावनाओं की खिड़कियों को बंद न करें अशोक कहते हैं कि आज के दौर में एआई को लेकर जबरदस्त उत्साह है। लोग, खासकर युवा मानते हैं कि एआई से सब कुछ हासिल किया जा सकता है। “असंभव जैसा कुछ नहीं होता। पहले तो हम संभावनाओं की खिड़कियों को बंद न करें। जो भी होगा, वह इस धरती पर सबसे ज्यादा बुद्धि रखने वाले इंसान के दिमाग और दिल से ही होगा। हमारे पास दिल और दिमाग दोनों हैं। दिमाग में गणित रहता है और दिल गणित विरोधी, लेकिन दिल और दिमाग अलग नहीं हैं।

एआई को हिंदी सिखाने पर चक्रधर ने कहा कि एआई को हिंदी सिखाना कठिन जरूर है, पर असंभव नहीं। जो गणनाएं और डाटा इसमें संग्रहित किए जा सकते हैं, वो अद्भुत हैं। आज ऐप्स हमसे हर तरह की अनुमति लेकर डाटा बैंक बना रहे हैं। परम कंप्यूटर से लेकर क्लाउड तक हमारे डाटा का भंडार आसमान तक फैला है, लेकिन इंसानी संवेदनाओं का गणित कोई कंप्यूटर नहीं कर सकता। यही हमारी असली पूंजी है।

राजनीति में अच्छे लोग हैं, वरना देश बिखर जाए राजनीति से दूरी के बावजूद अशोक चक्रधर ने साफ कहा,“अगर राजनीति मेरा क्षेत्र होता तो मैं बदलता नहीं। जो मेरी संवेदनाएं और प्रतिबद्धताएं हैं, वे वैसी ही रहतीं। राजनीति में अच्छे लोग हैं, वरना देश बिखर जाए। हमें निंदक वाणी को रोककर चिंतन की वाणी को आगे लाना चाहिए। हमारा देश पहले से उज्जवल है और इसे और उज्जवल बनाने की जरूरत है।

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