डॉलर बनाम BRICS ग्लोबल पेमेंट सिस्टम बस शुरुआत, भारत के नेतृत्व में 11 देशों का बड़ा प्लान, टूटेगा अमेरिकी अधिपत्य?
नई दिल्ली: भारत में इस साल के अंत में BRICS शिखर सम्मेलन का आयोजन होने वाला है। इस दौरान नेशनल डिजिटल करेंसी को जोड़ने वाले पेमेंट सिस्टम पर सबकी नजर है। भारत में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान ब्रिक्स ग्लोबल फाइनेंस सिस्टम बनाने की नींव रखी जा सकती है, जिसमें ब्रिक्स देशों की डिजिटल करेंसी के बीच सीधे ट्रेड सेटलमेंट का रास्ता खुल सके। इससे ब्रिक्स देशों को डॉलर-आधारित SWIFT सिस्टम पर निर्भरता काफी कम हो जाएगी। भारत के नेतृत्व में ब्रिक्स के 11 सदस्य देश अमेरिकी अधिपत्य को चुनौती देने की शुरूआत कर सकते हैं।
ब्रिक्स शिखर सम्मलेन के दौरान भारत इंटरऑपरेबल सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDCs) पेमेंट मॉडल को पेश करने वाला है। इसका मकसद BRICS पेमेंट सिस्टम डेवलप करना होगा। इसकी सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसमें डी-डॉलराइजेशन जैसा ड्रामा नहीं है, बल्कि प्रैक्टिकल चीजों पर ध्यान दिया गया है। यानि डोनाल्ड ट्रंप, जो दुनिया को अपने इशारे पर हांकना चाह रहे हैं, उन्हें तगड़ा झटका लगेगा। ट्रंप ने बार बार ब्रिक्स देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी है, लेकिन भारत ने कूटनीति का अगल ही रास्ता चुना है, जिसमें ‘सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे’ की नीति है।
BRICS फाइनेंशियल सहयोग को लेकर एक गलतफहमी ये बनी है कि इसका मकसद BRICS करेंसी बनाना है, जो बिल्कुल भी सही नहीं है। भारत की ये एक शानदार डिप्लोमेसी का उदाहरण है, जिसके जरिए भारत ने पश्चिम को संदेश दिया है कि ब्रिक्स देशों का मकसद कोई BRICS करेंसी बनाना नहीं है, और ना ही अपनी संप्रभुता किसी ‘ताकतवर देश’ के हाथ में सौपने की है, बल्कि भारत का तरीका एक पेमेंट सिस्टम बनाने की है।ब्रिक्स पेमेंट सिस्टम से भारत के डिजिटल रुपये, चीन के डिजिटल युआन और रूस के डिजिटल रूबल जैसी मौजूदा नेशनल CBDC को इंटरऑपरेबल इंफ्रास्ट्रक्चर के आधार पर एक नेटवर्क में जुड़ जाएंगे। ऐसा करने से हर करेंसी पूरी तरह से आजाद रहेगी और किसी भी दूसरे देश की करेंसी पर निर्भर नहीं होगी। और इसी पहल के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने की शुरूआत भारत से होगी। यानि ना डॉलर पर निर्भरता रहेगी और ना ही चीनी युआन पर। अमेरिका अकसर डॉलर को डिप्लोमेटिक हथियार की तरह इस्तेमाल करता है और ब्रिक्स डिजिटल पेमेंट सिस्टम उसी हथियार पर करार वार है।
ब्रिक्स फाइनेंशियल सिस्टम बनने से ब्रिक्स देशों के बीच पेमेंट खुद ब खुद उन देशों की नेशनल करेंसी के साथ सेटल हो जाएंगे। ऐसा करके उन्हें अमेरिका के वर्चस्व वाले SWIFT पेमेंट सिस्टम से पूरी तरह छुटकारा मिल जाएगा। इसका कुछ बड़े फायदे हैं, जैसे तेज सेटलमेंट, ट्रांजैक्शन में लगने वाला लागत काफी कम, पश्चिमी देशों की तरफ से बात बात पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों का झंझट खत्म। इस सिस्टम से भारत का लक्ष्य ये है कि यह सिस्टम चीन केन्द्रित ना होकर ‘न्यूट्रल और मल्टी पोलर रहे।’ब्रिक्स पेमेंट सिस्टम को बनाने में भारत केन्द्रीय भूमिका निभा रहा है। भारत में इस साल ब्रिक्स शिखर सम्मेलन होगा और दिल्ली के डिप्लोमेट्स ने CBDC इंटरऑपरेबिलिटी को ठोस पॉलिसी कोऑर्डिनेशन तक पहुंचाया है। यह भारत की मजबूत डिजिटल पेमेंट सिस्टम को दिखाता है। भारत ने कामयाबी के साथ यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) पेमेंट सिस्टम को अपने घरेलू बाजार में लागू किया है। इससे पता चलता है कि भारत ने BRICS करेंसी के प्रस्तावों का विरोध क्यों किया था और भारत ने ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर का समर्थन कियास जो क्रॉस-बॉर्डर ट्रेड में नेशनल करेंसी को ज्यादा इस्तेमाल लायक बनाता है।
डॉलर और अमेरिकी प्रतिबंधों का डर क्यों हो जाएगा खत्म?
अमेरिका और पश्चिमी देश प्रतिबंधों को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं, जैसे रूस को SWIFT पेमेंट सिस्टम से रातों रात बाहर कर दिया गया था। इसके अलावा पश्चिमी देशों ने रूस का 300 अरब डॉलर फ्रीज कर दिया है। भारत पर भी परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका ने प्रतिबंध लगाया था। रूस पर लगे प्रतिबंधों ने साबित कर दिया कि बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को भी नुकसान पहुंचाने के लिए अमेरिका और पश्चिमी देश प्रतिबंधों और डॉलर को हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं। इसीलिए ब्रिक्स पेमेंट सिस्टम अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए भूकंप की तरह होगा। ये एक एक पैरेलल सिस्टम होगा, जो मुख्य सिस्टम खराब होने पर भी व्यापार को चालू रखता है। यानि SWIFT पेमेंट सिस्टम से निकाले जाने का डर खत्म हो जाएगा।
