इंडोनेशिया के जैसा राफेल लड़ाकू विमान फिर भी भारत चुका रहा ज्यादा दाम? फ्रांसीसी जेट की कीमत का ब्रेकडाउन

पेरिस/नई दिल्ली: भारत और फ्रांस के बीच राफेल लड़ाकू विमान पर लेटेस्ट अपडेट यह है कि दोनों देशों के बीच अब कीमत, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर समेत दूसरे मुद्दों पर बातचीत चल रही है। भारत के डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल (DAC) ने फ्रांस से 114 राफेल फाइटर जेट खरीदने के लिए करीब 3.60 लाख करोड़ रुपये के कैपिटल एक्विजिशन प्रपोजल के लिए एक्सेप्टेंस ऑफ नेसेसिटी यानि AoN को मंजूरी दे दी है। राफेल डील के लिए ये सबसे प्रमुख कदम है। इस प्रस्ताव में भारतीय नौसेना के लिए अमेरिका से छह P-8I लॉन्ग-रेंज मैरीटाइम रिकॉनिसेंस एयरक्राफ्ट भी शामिल हैं।

प्रस्ताविक सौदे के मुताबिक 114 राफेल फाइटर जेट में से 18 विमानों को फ्रांस से डायरेक्टर खरीदा जाएगा। यानि वो पूरी तरह से तैयार होंगे। जबकि बाकी 96 राफेल लड़ाकू विमानों को मेक इन इंडिया के तहत भारत में निर्माण होगा। फ्रांसीसी अखबार L’Essentiel de l’Éco की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘मेक इन इंडिया’ भारत की सबसे बड़ी शर्त है और इसपर भारत कोई भी समझौता करने के मूड में नहीं है। इसने लिखा है कि फ्रांस को देश के बाहर एसेंबली लाइन ले जाने में हिचकिचाहट तो है, लेकिन वो हाथ से एक विशालकाय डील को निकलते नहीं देखना चाहता।

इंडोनेशिया और भारत के राफेल डील में कितना अंतर है?
भारत 18 राफेल पूरी तरह से तैयार कंडीशन में फ्रांस से मंगवाएगा। इसके अलावा राफेल के F4 वैरिएंट के 88 सिंगल सीट विमान होंगे और 26 विमान डबल सीट वाले होंगे। इंडोनेशिया ने फरवरी 2022 में फ्रांस से 42 राफेल खरीदने के लिए सौदा किया था। डील को तीन हिस्सों (6 + 18 +18) में बांटा गया था जिन्हें एक के बाद एक फरवरी 2022, अगस्त 2023, जनवरी 2024 में लागू होना था।दिलचस्प बात यह है कि इंडोनेशियाई सरकार ने 42 राफेल फाइटर जेट्स के लिए 8.1 अरब डॉलर यानी करीब 68,000 करोड़ रुपये की डील साइन की थी। यानी हर एयरक्राफ्ट की कीमत करीब 1,747 करोड़ रुपये है। वहीं भारत 114 राफेल के लिए करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये का समझौता कर रहा है। यानि हर जेट के लिए करीब 2,850 करोड़ रुपये की डील हो रहा है, यानी करीब 1.5 गुना ज्यादा। इसीलिए जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर भारत प्रति लड़ाकू विमान करीब 1000 करोड़ रुपये ज्यादा भुगतान क्यों कर रहा है?
भारत प्रति विमान करीब 1000 करोड़ रुपये का भुगतान क्यों कर रहा?
राफेल विमानों की क्षमता में अंतर- भारत अपनी जरूरतों के हिसाब से डिजाइन किए गये विमान खरीद रहा है। इसके अलावा भारत के पैकेज में इंडोनेशिया के मुकाबले काफी ज्यादा साजो सामान हैं। भारत की डील में एडवांस्ड मेटियोर और SCALP मिसाइलें, HAMMER प्रिसिजन-गाइडेड बम, फुल-मिशन सिमुलेटर, लंबे समय तक मेंटेनेंस, स्पेयर पार्ट्स और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर शामिल हैं। असल में, भारत एयरक्राफ्ट की पूरी लाइफ-साइकल के लिए भुगतान कर रहा है, जिससे लंबे समय में यह पूरी डील ज्यादा किफायती हो जाती है। इसके अलावा SCALP मिसाइलों को भी आगे जाकर भारत में ही बनाया जाएगा।

अगल अलग मौसम में उड़ान- भारतीय राफेल लद्दाख जैसे अत्यंत बर्फीले जगहों से लेकर जैसेलमेर, जहां भयानक गर्मी होती है और लद्दाख से बिल्कुल उलट मौसम होता है, दोनों ही जगहों पर उड़ान भरेंगे। इसीलिए उस हिसाब से भी विमानों में कुछ बदलाव किए जाएंगे।

पुराने राफेल का अपग्रेडेशन- भारत फिलहाल राफेल का F3R वैरिएंट ऑपरेट करता है। धीरे धीरे इन विमानों को F4 वैरिएंट में अपग्रेड किया जाएगा।

F5 वैरिएंट- राफेल के F4 वैरिएंट के अलावा भारत फ्रांस से 24 F5 वैरिएंट विमान भी खरीदने के लिए डील करेगा। इसकी कई क्षमताएं छठी पीढ़ी के विमान जैसी होंगी। ये फ्रांस में ही बनेंगे, लेकिन इसकी कीमत एफ4 से काफी ज्यादा होगी। इसीलिए इंडोनेशिया के मुकाबले औसतन भारतीय विमान महंगे हैं।

लॉजिस्टिक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर- पुराने सौदे के तहत भारत के दो प्रमुख एयरबेस अंबाला और हाशिमारा पर पूर्ण रखरखाव और मरम्मत केंद्र बनवाए गये थे, जिन्हें अपग्रेड किया जाएगा। इसके अलावा भारत में जिस असेंबली लाइन का निर्माण होगा, जाहिर तौर पर उनके निर्माण का खर्च आएगा। जबकि इंडोनेशिया में कोई असेंबली लाइन नहीं है, तो उसे उसका खर्च नहीं आया है।

इंजन तकनीक- फ्रांसीसी मीडिया ने पुष्टि की ही है कि भारत की कोशिश राफेल के M88 इंजन को बनाने की तकनीक (Safran के साथ मिलकर) भारत को मिले ताकि भविष्य के स्वदेशी फाइटर जेट्स (जैसे AMCA) में भी इसका इस्तेमाल हो सके।

राफेल के लिए भारतीय डील महंगा मगर अच्छा क्यों है?
फ्रांसीसी मीडिया में भारत में राफेल का इको सिस्टम बनाने को लेकर थोड़ी हिचकिचाहट देखी जा रही है। लेकिन विशालकाय सौदा होने की वजह से वो सौदे को जरूरी भी बता रहे हैं। उनके मुताबिक भारत में फैक्ट्री सेटअप किया जाएगा, ट्रेनिंग सेंटर बनाए जाएंगे, मेंटेनेंस इंफ्रास्ट्रक्चर को डेवलप किया जाएगा और कई कंपोनेंट्स का टेक्नोलॉजी ट्रांसफर किया जाएगा। इसीलिए भारत का ये डील बहुत विशाल जरूर नजर आ रहा है, लेकिन जरूरत को देखते हुए सस्ता नहीं, मगर सबसे अच्छा जरूर है।

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