दो-दो मुख्यमंत्री देने वाला क्षेत्र महज आश्वासनों के सहारे

मंदसौर  ।   प्रदेश की सीमा के अंतिम छोर पर बसे मंदसौर और नीमच जिलों की पहचान अफीम उत्पादक क्षेत्र के रूप में तो है ही इन जिलों ने प्रदेश को सुंदर लाल पटवा और वीरेंद्र कुमार सखलेचा जैसे मुख्यमंत्री भी दिए हैं। बावजूद इसके मंदसौर-नीमच को वह समृद्धि अब तक नहीं मिल सकी जिसका ये क्षेत्र हकदार है। सरकारों में इस क्षेत्र को भरपूर प्रतिनिधित्व मिलता रहा लेकिन तमाम जनप्रतिनिधि विकास के नाम पर किसी बड़ी परियोजना की नींव नहीं रख सके।

इन नेताओं ने दिया नेतृत्‍व

दो मुख्यमंत्रियों के अलावा श्यायमसुंदर पाटीदार लंबे समय तक प्रदेश सरकार में मंत्री रहे। 1990 से 92 की भाजपा सरकार में कैलाश चावला गृह मंत्री रहे तो 1993 से 2003 की कांग्रेस सरकार में चार कैबिनेट मंत्री नरेंद्र नाहटा, सुभाष सोजतिया, घनश्याम पाटीदार व महेंद्र सिंह कालूखेड़ा रहे।

2003 के बाद कैलाश चावला, जगदीश देवड़ा लगातार मंत्री रहे। 2008 से 2013 में जगदीश देवड़ा कैबिनेट मंत्री रहे। फिर अभी 2020 के बाद से तीन कैबिनेट मंत्री जगदीश देवड़ा, हरदीपसिंह डंग, ओमप्रकाश सखलेचा हैं। दोनों दलों में इतने कैबिनेट मंत्री रहते हुए भी मंदसौर जिला विकास के नाम पर रीता ही है। न नए उद्योग लगे, न रोजगार के लिए परंपरागत योजनाओं से इतर कोई प्रयास हुए। नीमच में लगी सीमेंट कारपोरेशन की इकलौती फैक्ट्री भी लंबे समय से बंद है। अब फिर चुनाव सामने हैं। वादों और घोषणाओं की वर्षा लगातार हो रही है। लेकिन लोग इंतजार में है कि ये योजनाएं धरती पर कब उतरेंगी। चुनाव में फिर वादों की वर्षा शुरू हो गई है।

राजस्थान की सीमा में फैक्ट्रियों की भरमार

क्षेत्र में सीमेंट के पत्थर की प्रचुरता की वजह से नीमच से 50 किमी राजस्थान की सीमा में सीमेंट की 10 निजी फैक्ट्रियां चल रही हैं और सभी मुनाफे में हैं। मध्य प्रदेश के सरकारी उपक्रम यहां चल नहीं पा रहे हैं। जिले के प्रभावशाली जनप्रतिनिधियों ने कभी भी सीसीआई फैक्ट्री को फिर से चालू करने की कोशिश ही नहीं की। जबकि पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरेंद्र कुमार सखलेचा के विधानसभा क्षेत्र जावद में ही यह फैक्ट्री थी।

अभी उनके पुत्र ओमप्रकाश सखलेचा 15 सालों से विधायक हैं। लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्री भी हैं। वहीं तत्कालीन केंद्रीय मंत्री स्व. माधवराव सिंधिया खाद का बड़ा कारखाना यहां से गुना ले गए थे। इसके बाद इस क्षेत्र के औद्योगिक विकास के प्रति बेरुखी बढ़ती गई।

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