भाजपा की आंधी में इस बार कांग्रेस के ऐसे किले भी ढह गए जो भाजपा के लिए अब तक ‘अजेय’ थे

इंदौर ।   मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव घोषित होने के 24 घंटे बाद तक भी भाजपा की प्रचंड आंधी की सनसनाहट कांग्रेस के कानों में गूंज रही है। मतगणना शुरू होने के कुछ घंटों पहले तक कांग्रेस की अग्रिम पंक्ति के नेता जिस आत्मविश्वास से सरकार बनाने के दावे करते नजर आ रहे थे अब वे खामोशी से इस बड़ी पराजय को पन्नों में समेटने में जुटे हैं। 2018 के चुनाव में मालवा-निमाड़ क्षेत्र में 66 में से 35 सीटें जीतने वाली कांग्रेस इस बार 18 सीटों पर ही सिमट गई। यहां के 14 में से सात जिलों में कांग्रेस शून्य को भेद नहीं पाई। ऐसा नहीं है कि इस बार कांग्रेस किसी नई समस्या से जूझते हुए यहां चुनाव हारी है। हर बार की तरह इस बार भी कमजोर संगठन, नेताओं में आपसी तालमेल की कमी, सुस्त चुनाव प्रचार और कांग्रेस नेताओं के अति आत्मविश्वास ने कांग्रेस को करारी हार के मुहाने पर ला खड़ा किया। भाजपा की आंधी में इस बार कांग्रेस के ऐसे किले भी ढह गए जो भाजपा के लिए अब तक ‘अजेय’ थे।

सिर्फ बयानों का सहारा…मैदान से किनारा

पूरे चुनाव के दौरान भाजपा ने जिस आक्रामक शैली में प्रचार अभियान 66 विधानासभा क्षेत्रो में चलाया, कांग्रेस उसके आसपास भी नजर नहीं आई। प्रत्याशी चयन में महीनों पहले ‘हमारी तैयारी पूरी’ का दावा करने वाली कांग्रेस अपने प्रत्याशी घोषित करने में भी पीछे रह गई। कांग्रेस नेता बार-बार हमारा क्या कसूर था, हमारी सरकार क्यों गिराई जैसे जुमले बोलकर सहानुभूति बटोरने का प्रयास अवश्य करते रहे लेकिन जब भाजपा के बड़े नेता मैदान में उतरे तो मुकाबले के लिए कांग्रेस की अग्रिम पंक्ति उतनी ताकत नहीं झोंक पाई। और तो और कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के दौरे भी अधिक नहीं हो सके। राहुल और प्रियंका गांधी वाड्रा की सभाएं भी सीमित क्षेत्रों में हुई। सिर्फ भाजपा सरकार की एंटी इंकमंबेंसी के सहारे पूरे चुनाव में कांग्रेस जबरदस्त लेकिन अति आत्मविश्वास में रही जो हार की बड़ी वजह बना। इंदौर, बुरहानपुर, खंडवा, शाजापुर,नीमच,रतलाम और देवास में कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी।

काम नहीं आए सर्वे, टिकट वितरण के असंतोष को भी संभाल नहीं पाए

कांग्रेस प्रत्याशी लंबे समय से भाजपा के मुकाबले कमजोर संगठन की समस्या से जूझ रहे हैं। टिकट मिलने के बाद अपनी टीम के सहारे ही प्रत्यशी किला लड़ाते हैं संगठन से बहुत अधिक सहायता नहीं मिल पाती। उधर, बड़े नेताओं ने कार्यकर्ताओं को आश्वास्त किया था कि टिकट वितरण मैदानी सर्वे के आधार पर ही होगा लेकिन जब सूची आई तो न सर्वे को आधार बनाया न कार्यकर्ताओं के फीडबैक को। टिकट उन्हें ही मिले जो बड़े नेताओं की पसंद थे। महू, आलोट, धार जैसे विधानसभा क्षेत्रों में यही असंतोष त्रिकोणीय संघर्ष का कारण बना और कांग्रेस ने सीटें गंवा दी।

इस बार बड़े नेता भी नहीं बचा पाए अपने गढ़

बीते चुनाव में भाजपा की लहर में भी अपने किले सुरक्षित रखने वाले कांग्रेस के बड़े नेता इस बार की आंधी में अपने गढ़ नहीं बचा पाए। कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष जीतू पटवारी राऊ विधानसभा क्षेत्र से बड़े अंतर से चुनाव हार गए। पटवारी ने कांग्रेस के स्टार प्रचारक के रूप में आसपास के जिलों में भी प्रचार की कमान संभाली लेकिन उनकी मेहनत अधिक काम नहीं आई। महेश्वर से डा. विजय लक्ष्मी साधौ, शाजापुर से हुकुमसिंह कराड़ा और सोनकच्छ से सज्जन सिंह वर्मा सहित अंचल के अन्य बड़े नेता अपना क्षेत्र नहीं बचा पाए। ये सभी नेता बीती कांग्रेस सरकार में केबिनट मंत्री रहे हैं।

न जाति गणना का फार्मूला काम आया, न ओपीएस का वादा

कांग्रेस ने चुनाव प्रचार में जगह-जगह यह कहा कि सरकार बनते ही जाति आधारित गणना करवाएंगे। इसके अलावा सरकारी कर्मचारियों के लिए फिर से ओल्ड पेंशन योजना शुरू कर देंगे। कांग्रेस नेताओं को यह उम्मीद थी कि इस तरह की घोषणाएं चुनाव में खासी असरकारक साबित होंगी, लेकिन कर्मचारियों की नाराजगी के बाद भी उन्हें इन योजनाओं के नाम पर वोट नहीं मिले। पड़ोसी राज्य राजस्थान की तर्ज पर 500 रुपये में गैस सिलेंडर और 25 लाख रुपये की स्वास्थ्य बीमा योजना का जादू भी यहां काम नहीं आया।

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