मायावती के अकेले चुनावी मैदान में उतरने के ऐलान का क्या है मतलब, क्या BJP-SP को घेरने की तैयारी
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक दलों ने अपने पत्ते खोलने शुरू कर दिए हैं। समाजवादी पार्टी एक बार फिर विधानसभा चुनाव 2027 में कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनावी मैदान में उतरती दिख सकती है। वहीं, एनडीए में भारतीय जनता पार्टी के साथ राष्ट्रीय लोक दल, अपना दल एस, निषाद पार्टी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का एकजुट रहना तय माना जा रहा है। भले ही चुनाव के समय तक कुछ उठापटक होती दिखे, लेकिन आखिर में एनडीए बिहार चुनाव 2025 की तरह एकजुट होकर चुनावी मैदान में उतरती दिख सकती है। वहीं, मायावती ने अपने पत्ते साफ कर दिए हैं। उन्होंने अकेले चुनावी मैदान में उतरने का फैसला कर लिया है। लोकसभा चुनाव 2024 के बाद से मायावती लगातार पार्टी को एक बार फिर जमीन पर मजबूत बनाने की रणनीति पर काम करती दिख रही हैं। ऐसे में विधानसभा चुनाव 2027 पार्टी के लिए अहम माना जा रहा है।
क्या है मायावती की घोषणा?
मायावती ने यूपी चुनाव 2027 को लेकर साफ कर दिया है कि बहुजन समाज पार्टी इसमें अकेले दम पर चुनावी मैदान में उतरेगी। मायावती ने साफ कहा है कि इन दिनों अर्टिफिशियल इंटलीजेंस (एआई) को सफलता की कुंजी बताने की स्वार्थी चर्चाएं चल रही है। इन सबके बीच मीडिया जगत में भी किसी न किसी बहाने बसपा के गठनबंधन में विधानसभा चुनाव लड़ने का भ्रम फैलाया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह फेक न्यूज है। मायावती ने कहा कि कई बार सार्वजनिक तौर पर बसपा के अकेले चुनाव लड़ने की बात कही जा चुकी है।
विपक्षी दलों पर साधा निशाना
बसपा प्रमुख ने विपक्षी दलों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी की सोच संकीर्ण है। ये लोग संविधान निर्माता बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के विरोधी हैं। इस कारण अनका अंबेडकरवादी बसपा से गठबंधन करने की नीति केवल इनके वोटों का राजनीतिक और चुनावी स्वार्थ है। इनसे गठबंधन करने से बसपा को केवल नुकसान ही होता है।
जमीन पर उतरने की रणनीति
बसपा प्रमुख मायावती ने 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर कैडरों को सक्रिय कर दिया है। बसपा हमेशा कैडर आधारित पार्टी रही है। पार्टी ने जमीनी स्तर से नेतृत्व तैयार प्रदेश में सफलता हासिल की है। बसपा में सफल होने के बाद नेता दूसरों दलों की राह पकड़ते दिखे हैं। ऐसे में पार्टी जमीनी कार्यकर्ताओं के सहारे एक बार फिर खोए जनाधार को पाने की कोशिश में है। इसमें गठबंधन की राजनीति से पार्टी को कोई बड़ा लाभ होता नहीं दिखा। 2019 में सपा के साथ गठबंधन के बाद बसपा के दलित वोटों में बिखराव दिखा।
विधानसभा चुनाव 2022 के दौरान बसपा से छिटके दलित वोटरों ने भाजपा का साथ दिया तो पार्टी ने ऐतिहासिक सफलता दर्ज की। कोई पार्टी लगभग साढ़े तीन दशक बाद लगातार दूसरी बार सत्ता में आने में कामयाब हुई। हालांकि, संविधान को खत्म करने की बात को जनता में स्थापित कर पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक यानी पीडीए पॉलिटिक्स के जरिए अखिलेश यादव ने 2024 के लोकसभा चुनाव में खेल किया।
लोकसभा चुनाव में बसपा से छिटककर निकला वोट बैंक सपा के पाले में जाता दिखा तो 2014 के लोकसभा चुनाव से प्रदेश की राजनीति में दमदार प्रदर्शन करती भाजपा को 33 सीटों पर सिमटना पड़ा। सपा 37 और कांग्रेस 6 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज करने में कामयाब हुई। अब बसपा एक बार फिर अपने जनाधार को वापस लाने की कोशिश में है। मायावती की रणनीति कामयाब हुई तो सपा-भाजपा को झटका लग सकता है।
