महेश्वर में 300 साल पुराना मंदिर, पंढरपुर से भगवान का विग्रह आने में लगे ढाई साल

मध्य प्रदेश के खरगोन में भगवान पंढरीनाथ रुकमणी का प्राचीन मंदिर है. मंदिर जिला मुख्यालय से 58 Km दूर महेश्वर में नर्मदा नदी के किनारे है. बताया जाता है कि पंढरपुर के तत्कालीन राजा ने लगभग 300 साल पहले होलकर स्टेट की महारानी देवी अहिल्याबाई होल्कर को भगवान के विग्रह भेंट में दिए थे, जिन्हें पंढरपुर से महेश्वर आने में करीब ढाई साल का समय लगा था.

मंदिर में भगवान पंढरीनाथ रुकमणी की श्वेत प्रतिमा है, जो पंढरपुर के मुख्य मंदिर में विराजित प्रतिमाओं का ही स्वरूप माना जाता है. देवी अहिल्या बाई ने मंदिर का निर्माण करवाकर यहां भगवान की स्थापना की थी. बाद में उन्हीं के गोदी पुत्र यशवंतराव होलकर (प्रथम) ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था.

पंढरपुर से जुड़ा इतिहास
मंदिर के पुजारी विपिन तिवारी ने बताया कि मंदिर से जुड़ी एक कहानी है. बताते हैं कि पंढरपुर महाराष्ट्र के राजा को चर्म रोग था. उन्हें स्वप्न आया की महेश्वर में चलने वाले अन्नकूट का जूठन खाने से रोग ठीक हो जाएगा. वह गुप्त रूप से महेश्वर आए और अन्नकूट का जूठन खाया, जिससे वह रोग मुक्त हो गए. इसके बाद वह प्रकट हुए और अहिल्या बाई होल्कर को अपने बारे में बताते हुए पूछा कि वह क्या भेंट करें. तब मातोश्री अहिल्या बाई ने पंढरपुर से भगवान का विग्रह मांगा.

भगवान को ओढ़ाई शॉल
पुजारी ने बताया कि मंदिर में आने वाले भक्तों का मानना है कि सर्दियों में जिस प्रकार हमे ठंड लगती है, उसी प्रकार भगवान को भी लगती होगी. इसलिए पौष माह में भगवान को ठंड से बचाने के लिए शॉल ओढ़ाई गई

अखंड नाम कीर्तन और अन्नकूट
मंदिर में सुबह-शाम अखंड ‘श्री हरे कृष्ण हरे राम’ नाम का कीर्तन और अन्नकूट चल रहा है. यह नाम कीर्तन तब से चल रहा है, जब प्रसिद्ध कथावाचक रामचंद्र डोंगरे ने महेश्वर में अपनी 108वीं भागवत कथा पूरी की थी.

साल में दो मुख्य आयोजन
पंडित विपिन तिवारी ने कहा कि भगवान पंढरीनाथ के साल में दो मुख्य आयोजन होते हैं. आषाढ़ पूर्णिमा और कार्तिक पूर्णिमा पर यहां दही लुटाते हैं. मटकी फोड़ का आयोजन करते हैं. इसके अलावा सालभर कुछ न कुछ आयोजन चलते रहते हैं. बड़ी संख्या में यहां भक्त आते हैं.

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