खेले मसाने में होली दिगंबर… मृत्य जश्न, भय भक्ति में तब्दील हो जाता है मणिकर्णिका के महाश्मशान में

बनारस, जहां मृत्यु भी एक उत्सव है, वहां की होली भला आम होली जैसी कैसे हो सकती है? यहां रंगों की जगह चिता की राख उड़ती है, गुलाल की जगह भस्म लगता है और उल्लास में गूंजती हैं तांत्रिक मंत्रों की ध्वनियां. इसे कहते हैं "मसान की होली", जो महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर खेली जाती है.ये केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि शिव की अलौकिक लीला का हिस्सा है, जहां मृत्यु का भय मिट जाता है और आत्मा मोक्ष की ओर बढ़ती है. इसी कड़ी में आइए जानते हैं इस रहस्यमयी और अनोखी होली के 8 दिलचस्प पहलू.

 मसान की होली (Masan Holi 2025 Varanasi) काशी के महाश्मशान (मणिकर्णिका घाट) पर खेली जाती है, जहां चिताएं दिन-रात जलती रहती हैं.इसे मृत्यु से जुड़े भय को दूर करने का प्रतीक माना जाता है. इस साल मसान होली 11 मार्च को मनाई जाएगी.

 मान्यता है कि काशी में स्वयं महादेव संन्यासियों और औघड़ों के साथ होली खेलते हैं.यहां महाकाल को रंगों की नहीं, बल्कि चिता भस्म की होली पसंद है. आम लोग इसमें शामिल नहीं हो सकते क्योंकि ये सिर्फ तांत्रिक परंपराओं को मानने वाले साधुओं के लिए होती है. बिना तांत्रिक दीक्षा के इसमें शामिल होना अनुष्ठान के नियमों के विरुद्ध माना जाता है.
 लोककथाओं के अनुसार, इस होली में अदृश्य शक्तियां, भूत-प्रेत और शिव के गण भी शामिल होते हैं.यहां लोग निडर होकर उल्लास और भक्ति के साथ इस अनोखी होली को मनाते हैं.
 रंगों की जगह चिता भस्म का प्रयोग किया जाता है.इसे जीवन-मृत्यु के चक्र को स्वीकारने का प्रतीक माना जाता है, जिससे व्यक्ति मृत्यु का भय त्यागकर जीवन को खुले दिल से जी सके.
 इस होली में विशेष रूप से तांत्रिक, अघोरी और नागा साधु हिस्सा लेते हैं, जो मृत्यु को मोक्ष का द्वार मानते हैं.वे शिव की भक्ति में लीन होकर चिता भस्म से खुद को रंगते हैं.

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