चैत्र के महीने में करें तुलसी का छोटा उपाय, बदल जाएगा भाग्य! वैवाहिक जीवन में आएंगी खुशियां

चैत्र का महीना हिंदू धर्म में बहुत विशेष महत्व रखता है. क्योंकि इस मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से हिंदू नववर्ष की शुरुआत होती है. इस माह में विशेष तौर पर मां दुर्गा की उपासना की जाती है साथ ही मां तुलसी का भी पूजन होता है. इसके साथ ही चैत्र के पवित्र महीने में तुलसी से जुड़े उपाय भी कर सकते हैं. तुलसी के इन उपायों से मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है साथ ही घर में सुख-समृद्धि आती है, साथ ही आर्थिक तंगी से छुटकारा मिलता है.
तो आइए जानते हैं पंडित रमाकांत मिश्रा के अनुसार, तुलसी के उपायों के बारे में विस्तार से जानते हैं.

मां लक्ष्मी की करें उपासना
यदि आपके जीवन में लंबे समय से परेशानियां बनी हुई हैं तो चैत्र मास में इस उपाय को करने से आपको इससे छुटकारा मिल सकता है. चैत्र मास में गुरुवार के दिन सुबह स्नान करके मां लक्ष्मी का विधि विधान से पूजन करें. इस दिन शाम के समय तुलसी के पौधे के पास देसी घी का दीपक लगाना चाहिए. इन सरल उपायों को करने से मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और आर्थिक तंगी दूर होती है.

प्रेम जीवन की परेशानियां होंगी दूर
अगर आपके जीवन में प्रेम संबंधी कोई परेशानी चल रही है और जीवन में उलझने आ रही हैं या विवाह संबंधी कार्यों में विघ्न आ रहें हैं तो चैत्र माह में तुलसी से जुड़ा ये उपाय आपके लिए कारगर साबित हो सकता है. इसके लिए आपको चैत्र मास में किसी शुभ तिथि पर मां तुलसी का विधि विधान से पूजन करें और उन्हें सोलह श्रृंगार अर्पित करें.

श्रृंगार सामग्री का प्रसाद महिलाओं में बांट दें. इस उपाय को करने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी साथ ही पति-पत्नी के बीच प्यार बढ़ेगा व वैवाहिक जीवन में चल रही परेशानियां भी दूर होंगी.

मां तुलसी को प्रसन्न करने के मंत्र
अगर लंबे समय से आर्थिक तंगी आपको परेशान कर रही है तो चैत्र मास में मां तुलसी की उपासना आपके लिए बेहद शुभ साबित हो सकती है. इस मास में रोजाना तुलसी के पौधे में कच्चे दूध का अर्घ्य देने और कुछ मंत्रों का उच्चारण करने से आपकी आर्थिक तंगी दूर होगी और धन लाभ के योग भी बनने प्रारंभ हो जाएंगे.

तुलसी नामाष्टक मंत्र का करें पाठ –
वृंदा वृंदावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी।
पुष्पसारा नंदनीय तुलसी कृष्ण जीवनी।।
एतभामांष्टक चैव स्त्रोतं नामर्थं संयुतम।
य: पठेत तां च सम्पूज्य सौश्रमेघ फलंलमेता।।

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