बीजिंग में भारतीय दूतावास का वसंत मेला, 4000 से अधिक चीनी लोगों ने लिया हिस्सा

बीते दिनों चीन की राजधानी बीजिंग में वसंत मेले का आयोजन किया गया. इसमें चार हजार से चीनी लोगों ने शिरकत की. भारतीय दूतावास द्वारा आयोजित यह मेला दोनों देशों के बीच रिश्तों की एक नई शुरुआत का प्रतीक बन गया. चार साल की ठंडक के बाद खासकर 2020 में लद्दाख की हिंसक झड़प के बाद दोनों देश अब अपने संबंधों को बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं. इस मेले में भारतीय संस्कृति की शानदार झलक दिखी. कई तरह के शास्त्रीय नृत्य जैसे भरतनाट्यम और कथक हुए, जिन्हें ज्यादातर चीन के कलाकारों ने पेश किया. भारतीय खाने, हस्तशिल्प, आर्टिफिशियल गहने और कपड़ों के स्टॉल भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बने.

इस आयोजन में भारत-चीन की दोस्ती साफ नजर आई. इसमें चीन के विदेश मंत्रालय के डायरेक्टर जनरल लियू जिंसॉन्ग भी शामिल हुए. भारतीय राजदूत प्रदीप कुमार रावत ने उनका और भारी संख्या में आए चीनी लोगों का स्वागत किया. रावत ने कहा कि वसंत नई शुरुआत और रिश्तों को मजबूत करने का समय है. यह मेला उस वक्त हुआ, जब पिछले साल अक्टूबर में रूस के कजान में ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात हुई थी. इस मुलाकात ने रिश्तों में चार साल से जमीं बर्फ को पिघलाने का काम किया है. इसके बाद दोनों देशों के अधिकारियों के बीच कई हाईलेवल मीटिंग हुई.

पीएम मोदी की उम्मीदें
हाल ही में एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत-चीन रिश्तों पर सकारात्मक बातें कहीं. उन्होंने कहा कि सीमा पर हालात सामान्य हो गए हैं और दोनों देशों को अपने रिश्ते मजबूत करने चाहिए. यह बयान इसलिए खास है क्योंकि 2020 में लद्दाख की झड़प ने दोनों देशों के बीच तनाव बहुत बढ़ा दिया था. चीन की विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने मोदी के बयान की तारीफ की और कहा कि दोनों देशों को एक-दूसरे की सफलता में भागीदार बनना चाहिए. हाल के दिनों में रिश्तों में सुधार हुआ है, लेकिन अभी भी कई चुनौतियां बाकी हैं, जिन्हें दूर करने के लिए मेहनत जरूरी है.

सहयोग के क्षेत्र और चुनौतियां
भारत और चीन के बीच कई सकारात्मक पहलू हैं. व्यापार इनमें सबसे अहम है. लद्दाख झड़प के बाद भी चीन, भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना रहा. दोनों देश ब्रिक्स और एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक जैसे संगठनों में साथ काम करते हैं. वे गैर-पश्चिमी आर्थिक मॉडल, आतंकवाद से लड़ाई और अमेरिकी नीतियों का विरोध करने में भी एक राय रखते हैं. लद्दाख की घटना के बाद दोनों देशों की सेनाओं के बीच बातचीत जारी रही. इसके बाद अक्टूबर में सीमा पर गश्त का समझौता हुआ. उसी महीने मोदी और शी जिनपिंग ने ब्रिक्स सम्मेलन में मुलाकात की और सहयोग बढ़ाने का वादा किया. जनवरी में दोनों देशों ने सीधी उड़ानें शुरू करने पर भी सहमति जताई.

रिश्तों में मुश्किलें
लेकिन रिश्तों में मुश्किलें भी कम नहीं हैं. भारत का अमेरिका और चीन का पाकिस्तान के साथ करीबी रिश्ता तनाव का कारण है. चीन कश्मीर में भारत की नीतियों का विरोध करता है और भारत को न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप व यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में स्थायी सदस्यता से रोकता है. चीन का नौसैनिक प्रभाव और उसका विदेशी सैन्य अड्डा भारत के समुद्री क्षेत्र में है. बेल्ट एंड रोड पहल को भारत ने खारिज कर दिया था. वहीं भारत भी ताइवान और दलाई लामा के साथ रिश्ते मजबूत कर रहा है, जिन्हें चीन अलगाववादी मानता है.

भविष्य के संकेत और वैश्विक हालात
रिश्तों का भविष्य कुछ अहम संकेतों पर टिका है. सीमा वार्ता सबसे बड़ा मुद्दा है. 2,100 मील लंबी सीमा का 50,000 वर्ग मील हिस्सा अभी भी विवादित है. पिछले साल का गश्त समझौता भरोसा बढ़ाने में मददगार था. मोदी और शी की मुलाकातें खासकर ब्रिक्स, जी20 और शंघाई सहयोग संगठन के सम्मेलनों में, रिश्तों को गति दे सकती हैं. क्षेत्रीय और वैश्विक बदलाव भी प्रभाव डालेंगे. भारत के पड़ोसी देशों में नए नेता हैं, जो चीन के करीब हैं, लेकिन भारत के साथ संतुलन बनाए हुए हैं. अगर चीन रूस के साथ साझेदारी कम करे, तो यह भारत-चीन रिश्तों के लिए अच्छा होगा. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां भी मायने रखती हैं. अगर वे चीन के साथ तनाव कम करते हैं और भारत को लगता है कि अमेरिका उसकी मदद नहीं करेगा, तो भारत चीन के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश करेगा.

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