अफ्रीका के सोने के खजाने पर चीन-US ने कर लिया था कब्‍जा, अब भारत ने चला मास्‍टरस्‍ट्रोक, पलटेगी बाजी!

ओगाडोगू/नई दिल्ली: भारत तेजी के साथ दुर्लभ खनिज रखने वाले अफ्रीकी देशों के बीच अपने पैर फैला रहा है। भारत ने पिछले कुछ दिनों में तीन अफ्रीकी देशों को जमकर खाद्य सहायता भेजी है। जिनमें से एक है बुर्किना फासो। ये एक काफी गरीब देश है और भारत ने यहां के कमजोर समुदायों और विस्थापित लोगों की मदद के लिए 1,000 मीट्रिक टन चावल भेजा है। भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सहायता भेजने की बात कही है। उन्होंने कहा कि यह कदम मानवीय सहायता और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ साझेदारी के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

इससे पहले मार्च में ही भारत ने अल नीनो मौसम पैटर्न से जुड़े गंभीर सूखे के बाद मलावी को भी 1,000 मीट्रिक टन चावल भेजा था। इस संकट की वजह से 40 लाख से ज्यादा लोगों को खाने की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है और सरकार ने आपदा की स्थिति घोषित कर दी है। मलावी के अलावा भारत ने भी अपनी मानवीय सहायता और आपदा राहत प्रयासों के तहत मोजाम्बिक में आई बाढ़ के बाद 500 मीट्रिक टन चावल और अतिरिक्त राहत सामग्री जिसमें तंबू, स्वच्छता किट और दवाएं शामिल थीं उसे भेजी हैं।

अफ्रीकी देशों में दुर्लभ खनिजों के लिए महाशक्तियों की रेस

भारत अफ्रीकी देशों को मानवीय सहायता उस वक्त पहुंचा रहा है जब इन देशों में दुर्लभ खनिजों का मिलना जारी है। इन खनिजों को लेकर चीन और अमेरिका रेस में हैं। भारत भी इस रेस में शामिल है। चीन की रणनीति इन्फ्रास्ट्रेक्चर डेवलपमेंट के लिए कर्ज देकर खदानों पर कब्जा करना है। वो इन देशों में रेलवे, बंदरगाह, एयरपोर्ट्स और बिजली प्रोजेक्ट्स में भारी निवेश कर रहा है जिसके बदले में ये देश उसे अपने प्राकृतिक संसाधनों में हिस्सा दे रहे हैं। दूसरी तरफ अमेरिका भी इन अफ्रीकी देशों में निजी क्षेत्रों में भागीदारी तेजी से बढ़ा रहा है और उसने भी बुनियादी ढांचा गलियारों में भारी भरकम निवेश किए हैं।इसीलिए भारत की मदद काफी अहम मानी जा रही है। भारत सीधे नागरिक से नागरिक संबंध बनाता है। भारत की रणनीति सहायता और कूटनीति का उपयोग करके ऐसे संबंध बनाने की है जो दीर्घकालिक आर्थिक हितों को बल प्रदान कर सकें। अफ्रीकी देशों में इसका काफी फायदा भी मिला है।

भारत ने अफ्रीका के खनिज क्षेत्र में अपनी पैठ और गहरी करने का संकेत दिए

सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस के एक हालिया पेपर में जिसका जिक्र Energyworld ने किया है, उसमें कहा गया है कि ‘भारत को अफ्रीका में मूल्य-आधारित महत्वपूर्ण खनिजों की कूटनीति को आगे बढ़ाना चाहिए’ और ऐसी साझेदारियों पर ध्यान देना चाहिए जिनमें टेक्नोलॉजी का हस्तांतरण और क्षमता निर्माण शामिल हो। इस पेपर ने इस पहल को बढ़ते वैश्विक ऊर्जा जोखिमों से जोड़ा है। इसमें बताया गया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास की बाधाओं ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में मौजूद कमजोरियों को उजागर कर दिया है।

आपको बता दें बुर्किनो फासो सोने की खदानों के लिए जाना जाता है। इसके अलावा क्रिटिकल मिनरल्स भी यहां भारी मात्रा में मौजूद हैं। यहां दुनिया के सबसे बड़े कच्चे मैंगनीज भंडारों में से एक है जो स्टील उत्पादन और बैटरी तकनीक के लिए अनिवार्य है। बुर्किना फासो अफ्रीका के प्रमुख जिंक उत्पादकों में से एक है। हालिया सर्वेक्षणों में यहां लिथियम और अन्य दुर्लभ खनिजों की संभावना जताई गई है जो ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।

चीन, अमेरिका के साथ भारत भी रेस में शामिल

चीन का बुर्किना फासो में दबदबा सबसे ज्यादा है। उसने बुनियादी ढांचे के बदले खनिज संसाधनों के समझौतों पर जोर दिया है। चीन यहां की कई खनन परियोजनाओं में बड़ा निवेशक है और खनिजों के प्रसंस्करण पर उसका नियंत्रण भारत और अमेरिका से कहीं ज्यादा है। ‘खनिज सुरक्षा साझेदारी’ (MSP) के जरिए अब अमेरिका अफ्रीका में चीन के एकाधिकार को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है ताकि उसे अपनी टेक इंडस्ट्री के लिए सुरक्षित सप्लाई चेन मिल सके।

जबकि भारत का लक्ष्य सीधे तौर पर खनन पट्टे हासिल करना और वहां के खनिजों को अपनी ‘मेक इन इंडिया’ और इलेक्ट्रिक वाहन (EV) नीति के लिए सुरक्षित करना है। भारत ने वहां कृषि और ऊर्जा क्षेत्र में निवेश बढ़ाकर एक विश्वसनीय सहयोगी की छवि बनाई है। भारत और बुर्किना फासो के बीच संबंध हमेशा से मैत्रीपूर्ण और सहयोगपूर्ण रहे हैं। भारत ने ‘साउथ-साउथ कोऑपरेशन’ के तहत बुर्किना फासो को कई ‘लाइन ऑफ क्रेडिट’ दी हैं। इनका उपयोग वहां बस सेवा, कृषि मशीनरी और बिजली परियोजनाओं के लिए किया गया है।
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