भोपाल मेट्रो परियोजना फिर लेट, तय समय सीमा से पिछड़ी भूमिगत टनल की खोदाई

भोपाल। राजधानी में मेट्रो परियोजना को लेकर किए जा रहे तेज रफ्तार विकास के दावों के बीच भूमिगत कॉरिडोर निर्माण की वास्तविक स्थिति सवालों के घेरे में आ गई है। भोपाल रेलवे स्टेशन से पुल पातरा तक बनने वाले पहले अंडरग्राउंड कॉरिडोर का काम तय समय सीमा से काफी पीछे चल रहा है।

मध्य प्रदेश मेट्रो रेल कार्पोरेशन लिमिटेड ने मार्च में सुरंग निर्माण शुरू करते समय मई अंत तक पहले चरण का काम पूरा करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन अब तक खोदाई आधी दूरी भी तय नहीं कर सकी है।

400 मीटर टनल का काम धीमी रफ्तार में

पुल पातरा से सिंधी कॉलोनी तक करीब 3.39 किलोमीटर लंबी ट्विन टनल बनाई जानी है। इसके लिए 30 मार्च को भोपाल रेलवे स्टेशन के पास 75 फीट नीचे पहली टनल बोरिंग मशीन (टीबीएम) से खुदाई शुरू की गई थी। मेट्रो अधिकारियों ने शुरुआती चरण में तेजी से काम पूरा होने का दावा किया था, लेकिन दो महीने बाद भी मशीन लगभग 50 मीटर तक ही पहुंच सकी है।

सुरक्षा कारणों का हवाला

मेट्रो प्रबंधन का कहना है कि सुरक्षा मानकों से समझौता नहीं किया जा सकता, इसलिए टीबीएम की गति सीमित रखी गई है। वर्तमान में प्रतिदिन लगभग एक से डेढ़ मीटर तक ही खुदाई हो पा रही है। अधिकारियों के अनुसार भूमिगत संरचना और आसपास की संवेदनशील इमारतों को देखते हुए बेहद सावधानी के साथ काम किया जा रहा है।

ग्राउटिंग प्रक्रिया बनी बड़ी बाधा

सूत्रों के मुताबिक देरी की सबसे बड़ी वजह सुरंग निर्माण के बीच की जाने वाली ग्राउटिंग प्रक्रिया है। यह तकनीकी प्रक्रिया सुरंग को मजबूती देने और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी होती है। हालांकि इसके चलते टीबीएम को बार-बार रोकना पड़ रहा है, जिससे परियोजना की गति लगातार प्रभावित हो रही है।

दूसरी टीबीएम 75 फीट नीचे बंद

नियमों के तहत पहली टीबीएम के 50 मीटर तक आगे बढ़ने के बाद ही दूसरी मशीन को चालू किया जा सकता है। यही कारण है कि दूसरी टीबीएम के सभी पार्ट्स इंस्टॉल होने और उसे काफी पहले 75 फीट गहरे शाफ्ट में उतार देने के बावजूद अब तक संचालन शुरू नहीं हो पाया है। मशीन फिलहाल निष्क्रिय पड़ी है।

इंजीनियरों की बड़ी टीम भी नहीं दिला सकी रफ्तार

परियोजना में थाईलैंड सहित पुणे, सूरत, मुंबई, दिल्ली और कानपुर के 12 वरिष्ठ इंजीनियरों समेत करीब 50 विशेषज्ञों की टीम काम कर रही है। इसके बावजूद मेट्रो प्रबंधन तय समय पर काम पूरा करने में विफल नजर आ रहा है, जिससे परियोजना की समयसीमा और लागत दोनों पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है।

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