भीष्म अष्टमी के व्रत करने से पितरों को मिलती है मुक्ति, जानें पूजा विधि और शुभ मुहूर्त

सनातम धर्म में भीष्म अष्टमी का विशेष महत्व माना गया है. जिसे भारत भर में हर वर्ष धूम धाम से मनाया जाता है. यह माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को ‘भीष्म अष्टमी’ कहा जाता है. इसी दिन भीष्म पितामह ने अपनी इच्छा से मृत्यु को गले लगाया था. महाभारत के अनुसार देवव्रत यानि भीष्म पितामाह को इक्षा मृत्यु का वरदान था जो  उनके ही पिता राजा शांतनु द्वारा दिया गया था. महाभारत युद्ध के दौरान जब पितामाह अर्जुन के तीरो से घायल होने के बाद लगभग 58 दिनों तक तीरों की सैया में लेटे रहे तब उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने का इतंजार किया और माघ मास में अपने प्राणों का त्याग किया. तब से इस दिन को भीष्म अष्टमी के नाम से जाना जाने लगा. इस दिन भक्त भीष्म अष्टमी का व्रत करने लगे.

हिंदू पंचांग के मुताबिक साल 2024 में भीष्म अष्टमी पर्व 16 फरवरी, शुक्रवार को मनाई जाएगी. जिसकी शुरुआत 16 फरवरी को ही दिन सुबह 8.54 मिनट पर होगी और इस तिथि की समाप्ति 17 फरवरी को सुबह 8.15 मिनट पर होगी. इस दिन जो व्यक्ति भीष्म पितामाह की पूर्ण मन से एवं विधि विधान से श्राद्ध करता है, उसे संतान की प्राप्ति होती है और मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है साथ ही पित्त दोष के भी मुक्ति मिलती है. पद्म पुराण के मुताबिक जीवित पिता वाले व्यक्ति को भी इस दिन भीष्म पितामह के लिये तर्पण करना चाहिए.

पूजा विधि
भीष्म अष्टमी उत्तरायण के दौरान आती है जो साल का सबसे पवित्र समय होता है. जब सूर्य अपनी उत्तर दिशा में होते हैं. माघ माह के शुक्ल पक्ष के आठवें दिन को मोक्ष का दिन भी कहा जाता है. इस दिन भीष्म की स्मृति में कुश घास, तिल और जल अर्पित करके तर्पण करना शुभ माना जाता है जो लोग इस दिन पूरी पवित्रता और सच्चे मन के साथ अपने पितरों का तर्पण विधि विधान के साथ करते हैं उनके पितरों को मुक्ति मिलती और उनका पित्त दोष दूर होता है.
 

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