क्या निशांत की तपस्या और त्याग हो गए बेकार, जब डिप्टी सीएम नहीं बने तो मंत्री क्यों बने

आम का मौसम है। आम तभी मीठा लगता है जब खुद पूरी तरह पक जाए। अधपका आम खट्टा लगता है। अगर जबरदस्ती (दवा से) आम पकाएंगे तो वह सेहत के लिए ठीक नहीं है। अगर मीठा फल खाना है तो आम के पकने का इंतजार करना ही होगा। निशांत कुमार बिल्कुल सही जा रहे थे। इंतजार के लिए मन भी बना लिया था। लेकिन उन्हें अधपका फल खाने के लिए मजबूर किया गया। उनके लिए यह कितना मीठा होगा?

जब उन्होंने कहा था राजनीति को समझने के लिए अभी समय लेंगे तो फिर ब‍िहार कैब‍िनेट व‍िस्‍तार में मंत्री पद क्यों स्वीकार कर लिया? जब अनुभवहीनता के कारण डिप्टी सीएम का पद इनकार दिया तो अब वे मंत्री पद के लिए क्यों राजी हो गए? इससे तो निशांत की त्याग और तपस्या मिट्टी में मिल गई।

विरोधियों को मिल गया बड़ा मुद्दा

जब निशांत ने डिप्टी सीएम बनने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था, उस समय उनकी बहुत तारीफ हुई थी। तेजस्वी यादव और रोहिणी आचार्य को बहुत कुछ कहने का मौका नहीं मिला पाया था। निशांत के राजनीति में आने के बाद भी विरोधियों को परिवारवाद का मुद्दा उछालने का मौका नहीं मिला क्योंकि उन्होंने पार्टी में या सरकार में कोई पद नहीं लिया था। लेकिन जैसे ही निशांत ने मंत्री पद स्वीकार किया वैसे ही तेजस्वी यादव और रोहिणी आचार्य को फिर मौका मिल गया। नीतीश कुमार ने परिवारवाद पर बहुत सुनाया था तेजस्वी को। अब लाजमी था कि तेजस्वी भी निशांत को ‘रिटर्न गिफ्ट’ दें। सुनाया है तो सुनना भी पड़ेगा।

मंत्री बने रहने के लिए किस सदन के सदस्य बनेंगे ?

अब मंत्री पद निशांत के लिए आसान नहीं होगा। वे हमेशा तेजस्वी के निशाने पर रहेंगे। मंत्री पद पर बने रहने के लिए वह आखिर किस सदन के सदस्य बनेंगे? विधानसभा उपचुनाव के लिए बांकीपुर की एक सीट है, लेकिन यह भाजपा कोटे की सीट है। नितिन नवीन के इस्तीफा देने से यह सीट खाली हुई है। अगर भाजपा मेहरबान हो जाए तो अलग बात है, वर्ना निशांत के लिए विधानसभा सदस्य बनना अभी मुमकिन नहीं दिख रहा। अब बाकी बची विधान परिषद की सीट। इस रास्ते से उच्च सदन का सदस्य बनना उनके लिए बहुत आसान है। 28 जून के बाद विधान परिषद की 9 सीटें खाली हो रही हैं।

अभी विधान परिषद सदस्य बने भी नहीं कि हो गया हमला शुरू

निशांत अभी विधान परिषद के सदस्य बने भी नहीं हैं कि राजद ने उन पर हमला शुरू कर दिया है। राजद ने सोशल मीडिया पर लिखा है, जब पिता ही (नीतीश कुमार) पिछले दरवाजे से (विधान परिषद) से सत्ता सुख भोगते रहे तो बेटा (निशांत कुमार) कैसे जनता का सामना (चुनाव) कर पाते। निशांत को दो दिन की लग्जरी यात्रा के बाद ज्ञान हुआ कि अब मंत्री बनने में ही भलाई है।विधान परिषद का सदस्य बनने के बाद उनकी मुश्किल तब और बढ़ जाएगी जब बिहार विधानमंडल का सत्र चलेगा। जब बिना किसी अनुभव के निशांत मंत्री के रूप में सदन के अंदर किसी प्रश्न का जवाब देंगे तो तेजस्वी पूरक प्रश्न पूछ-पूछ कर उन्हें परेशान कर देंगे। निशांत के लिए शायद यह असहज स्थिति होगी।

अब निशांत पर भी पदलोलुप होने का आरोप लगेगा

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जब निशांत ने जब सोच-विचार कर सद्भावना यात्रा शुरू की थी तब बीच में उन्हें मंत्री नहीं बनना चाहिए था। अगर मंत्री बनना ही था तो यह यात्रा नहीं शुरू करनी चाहिए थी। इससे बड़े मकसद वाली राजनीतिक यात्रा मजाक बन कर रह गई। अब तो यही आरोप लगेगा कि निशांत ने संघर्ष का रास्ता छोड़ कर आसान और सुविधाजनक रास्ता चुन लिया। निशांत अगर सद्भावना यात्रा के जरिये पार्टी में अपनी स्थिति मजबूत बनाते तो जदयू के लिए यह ज्यादा फायदेमंद रहता। जदयू को एक ऐसा नेता मिल जाता जो जनसंघर्ष से उपजा होता। नीतीश कुमार जैसे बड़े नेता के स्थान को कोई पदनिरपेक्ष नेता ही भर सकता है। लेकिन निशांत ने मंत्री बन कर इस मौके को गंवा दिया। अब उन पर भी पदलोलुपता का आरोप लगेगा।

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *