‘हमारी मूल आस्था तौहीद के खिलाफ है वंदे मातरम’, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद बोले मौलाना महमूद मदनी
सहारनपुर: सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम के गायन को लेकर दायर एक याचिका खारिज कर दी है। शीर्ष अदालत का कहना है कि गृह मंत्रालय के सर्कुलर में वंदे मातरम गाना अनिवार्य नहीं बनाया गया है। गीत न गाने पर किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई का कोई प्रावधान नहीं है। इस बीच, जमीयत उलमा-ए- हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने सुप्रीम कोर्ट के रुख पर अपनी प्रतिक्रिया दी है।पूर्व राज्यसभा सदस्य मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि जमीयत का स्पष्ट मत है कि वंदे मातरम हमारी मूल आस्था तौहीद के खिलाफ है। इसलिए किसी भी निर्देश के माध्यम से इसे गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। किसी भी नागरिक को उसके धर्म, आस्था और अंतरात्मा क खिलाफ काम करने के लिए मजबूर करना संविधान के खिलाफ है।
‘संविधान में धार्मिक स्वंतत्रता का पूरा अधिकार’
मदनी की तरफ जारी बयान में कहा गया है कि भारत का संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का पूरा अधिकार देता है। इसे किसी भी प्रशासनिक आदेश, सरकारी दबाव या सामाजिक दबाव के माध्यम से छीना नहीं जा सकता है।
अदालती लड़ाई की दी चेतावनी
मौलाना महमूद मदनी ने चेतावनी दी कि देश के किसी भी हिस्से में अगर किसी छात्र या संस्था को वंदे मातरम गाने के लिए बाध्य किया गया या उसके धार्मिक और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया गया तो जमीयत कोर्ट जाएगी और अदालती लड़ाई लड़ेगी।
‘अल्लाह के अलावा किसी और की इबादत नहीं कर सकते’
गौरतलब है कि मौलाना मदनी पहले भी कई मौकों पर वंदे मातरम को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर करते रहे हैं। उन्होंने कहा था कि वंदे मातरम पर जमीयत उलमा-ए-हिंद ने 2011 और इससे पहले भी काफी बहस की थी। उन्होंने कहा था कि मुसलमान अल्लाह के अलावा इबादत में किसी अन्य को शामिल नहीं कर सकता। वंदे मातरम का मतलब ही है- मां मैं तेरी पूजा करता हूं। यह मुसलमानों के धार्मिक विश्वास के खिलाफ है। किसी को इस्लाम की आस्था के खिलाफ कोई नारा या गीत गाने को मजबूर नहीं कर सकते।
