भोपाल पुलिस पर अवैध हिरासत, थर्ड डिग्री और अपराधियों को छोड़ने के आरोप; फिर भी आधे थानों के CCTV बंद

भोपाल। भोपाल में पुलिस की कार्यप्रणाली पहले से ही अवैध हिरासत, थर्ड डिग्री और अपराधियों को छोड़ने जैसे गंभीर आरोपों के घेरे में है। इसके बावजूद राजधानी के कई थानों और चौकियों में लगे सीसीटीवी कैमरे महीनों से बंद पड़े हैं।

स्थिति यह है कि शहर के करीब आधे थानों की निगरानी व्यवस्था प्रभावित हो चुकी है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जब थानों के भीतर होने वाली गतिविधियां ही रिकॉर्ड नहीं होंगी, तो जवाबदेही तय कैसे होगी।

68 थाने-चौकियों में लगे थे कैमरे

पुलिस मुख्यालय की टेलीकॉम शाखा ने थानों में लगे सीसीटीवी कैमरों के रखरखाव का ठेका टीसीआईएल के माध्यम से नागपुर की एक निजी कंपनी को दिया था। आरोप है कि कंपनी ने समय पर मेंटेनेंस नहीं किया और बाद में काम ही बंद कर दिया।

इसके बाद कैमरों की मरम्मत और निगरानी की जिम्मेदारी स्थानीय पुलिस पर आ गई। शहर के 68 थानों और चौकियों में सीसीटीवी सिस्टम लगाया गया था। प्रत्येक थाने में औसतन 13 और चौकियों में 6 कैमरे लगाए गए थे।

सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का उल्लंघन

सुप्रीम कोर्ट और मानव अधिकार आयोग की गाइडलाइन के अनुसार लॉकअप, पूछताछ कक्ष, प्रवेश द्वार और आम आवाजाही वाले हिस्सों में सीसीटीवी कैमरे लगाना अनिवार्य है। इसका उद्देश्य हिरासत में प्रताड़ना और अवैध गतिविधियों पर निगरानी रखना था।

इन थानों में ज्यादा परेशानी

महिला थाना, कमला नगर, अयोध्या नगर, पिपलानी और अशोका गार्डन सहित कई थानों में कैमरे लंबे समय से बंद बताए जा रहे हैं। कहीं शॉर्ट सर्किट, कहीं हाई वोल्टेज से एडॉप्टर जलने और कहीं नेटवर्क सिस्टम खराब होने जैसी समस्याएं सामने आई हैं।

इसके चलते लाइव मॉनिटरिंग और रिकॉर्डिंग दोनों प्रभावित हो रही हैं।

पुलिस खुद करा रही सुधार कार्य

मेंटेनेंस कंपनी के काम छोड़ने के बाद जिला पुलिस अपने स्तर पर सिस्टम सुधारने में जुटी है। कहीं स्थानीय तकनीशियन बुलाकर एडॉप्टर बदले जा रहे हैं तो कहीं इंटरनेट कनेक्टिविटी दुरुस्त करने की कोशिश की जा रही है।

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि खराबी आने पर ऑनलाइन टिकट जनरेट की जाती है, लेकिन समाधान में काफी समय लग रहा है।

क्यों गंभीर है मामला?

• हिरासत में पूछताछ की रिकॉर्डिंग प्रभावित

• थर्ड डिग्री और मारपीट के आरोपों की जांच मुश्किल

• फरियादियों और आरोपितों की सुरक्षा पर सवाल

• थानों की पारदर्शिता और जवाबदेही कमजोर

बीते महीनों में उठ चुके हैं सवाल

जनवरी 2026 में शाहपुरा थाने में एक युवक को पांच दिन तक अवैध हिरासत में रखने के आरोप लगे थे। इसी दौरान आरोपित पुलिस को चकमा देकर थाने से फरार हो गया था।

वहीं पिछले महीने एक युवक ने टीटीनगर पुलिस पर थर्ड डिग्री देने का आरोप लगाया था। शिकायत में उसने कहा था कि उसके पैरों में पिन चुभाई गई और बेरहमी से मारपीट की गई।

इसके अलावा पिछले महीने देहात क्षेत्र में तत्कालीन एसपी रामशरण प्रजापति ने थाने से अपराधियों को छोड़ने के आरोप में नजीराबाद थाना प्रभारी अरूण शर्मा को निलंबित किया था।

सुप्रीम कोर्ट की तीन अहम गाइडलाइन:

डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997):

हिरासत में यातना और मौत के मामलों में पारदर्शिता के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए।

परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह (2020):

हर थाने, लॉकअप और पूछताछ कक्ष में ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग वाले सीसीटीवी लगाने के निर्देश दिए गए।

शफी मोहम्मद बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2018):

पुलिस थानों में तकनीक आधारित निगरानी और पारदर्शिता पर जोर दिया गया।

कुछ थानों में कैमरों के बंद होने की शिकायत है। इसके लिए टीमें तुरंत जाकर सुधार कार्य करती हैं। कहीं भी पूरी तरह से सिस्टम बंद नहीं है। – वीके सिंह, एसपी, रेडियो

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *